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Akanksha Gupta (Vedantika)

Drama

3  

Akanksha Gupta (Vedantika)

Drama

अंतर्मन

अंतर्मन

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"हाँ तो तुम क्या कह रहे थे अपने आप से ?"

"कुछ नही सोच रहा था कि किसी मनुष्य का अहंकार उसे किस तरह नष्ट कर सकता है। "

"यह विचार तुम्हें पहले नही आया?"

"काश मैं सोच पाता कि किसी भी मनुष्य के अंदर कितने विकार है। वह किसी को भी अपने से आगे निकलते हुए नहीं देख सकता। फिर चाहे वह जिंदगी हो या मंजिल तक ले जाने वाली सड़क।"

"तो तुम्हें अफसोस है कि तुम भी उन्हीं में से एक हो"

"शायद हो सकता था अगर तुमने वक्त पर आवाज न दी होती। "

"मैं तो तुम्हें कब से आवाज दे रहा था। मुझे लगा कि तुम भी उसी भीड़ का हिस्सा बन जाओगे जो किसी गरीब को सिर्फ इसलिए मारने पर उतारू थीं क्योंकि उसने उस वक्त रास्ता पार करने की हिम्मत की जब तुम सब अमीरी के नशे में चूर सड़को पर हवाई अड्डा बनाने पर तुले हुए थे। "

"हाँ हमारे लिए जिंदगी के लिए का मतलब यही तो है कि अगर हम कार वाले हैं तो हम अमीर लोग और बाइक वाला गरीब। बाइक और साइकिल में भी हैसियत का उतना ही फर्क होता हैं हमारे लिए। "

"पर जीने का अधिकार तो सभी को हैं। इस बात का एहसास तुम्हें वक्त रहते हो गया था जब तुम उस गरीब आदमी को आदमखोर भीड़ के चंगुल से बचा कर ले आये थे।

तुमने सही समय पर मुझे आवाज जो दे दी थी। तुम हमेशा से ही मेरे साथ साथ चलते हो। तुम मेरे अंतर्मन हो जो मुझे कभी भटकने नहीं देता।


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