Anant Chourey

Inspirational


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Anant Chourey

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अनजान पता

अनजान पता

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दोस्तों अक्सर हम देखते हैं कि कुछ लोग सफलता पाने के लिए एक या दो बार प्रयास करते हैं और उन्हें सफलता मिल जाती है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सफलता पाने के लिए बहुत बार प्रयास करते हैं लेकिन उन्हें फिर भी सफलता नहीं मिलती तो उनका उस चीज से भरोसा ही उठ जाता है और वो उस चीज को पाने के लिये दोबारा कभी प्रयास नहीं करते हैं जिसकी वजह से उनकी उम्मीद टूट जाती है। तो ये कहानी भी इसी बात पर आधारित है तो चलिये बढ़ते हैं कहानी की ओर-


ये बात करीब 50 साल पुरानी है जब भारत में जब भारत में टेलीविजन का सिर्फ नाम ही सुना जाता था और मोबाइल/फोन का तो उस समय नामो-निशान भी नहीं था।सिर्फ रेडियो और अखबारों के जरिए ही लोग देश की खबरों से देश के हालात का अनुमान लगा लिया करते थे। इसी बीच रामोदास नाम का एक व्यक्ति था। उसे कविताएं लिखने का बहुत शौक था लेकिन वह गरीब परिवार से था बचपन में उसके माँ-बाप चल बसे थे इसलिए अकेला रहता था। वह चाहता था कि उसकी कविताएं अखबार में छपे।उसने कई बार अपनी कविताएं अखबार कार्यालय में भेजीं लेकिन कभी उसकी कविताएं अखबार में नही छपीं और न ही अखबार कार्यालय से कोई जवाब आया।रामोदास हर दिन एक नई कविता अखबार कार्यालय में भेजता लेकिन जातिवाद के चलते न ही कोई व्यक्ति उसकी कविताओं को अखबार में छापता और न ही कोई आस-पड़ोस का व्यक्ति उसकी कविताओं को पढ़ता।

अब रामोदास हिम्मत हार चुका था और अखबार में अपनी कविता छपने की उम्मीद भी छोड़ चुका था। लेकिन उसने कविताएं लिखना नहीं छोड़ा था।

रामोदास अपने मन को बदल चुका था और अपनी कविताओं को अखबार में छपवाने के लिये उसने दोबारा कभी प्रयास नही किया बल्कि किअनजान पते  पर अपनी कविताएं भेजने लगा और उसने खुद वो जगह नहीं देखी थी जिस पते पर वह अपनी कविताओं को भेजता था उसने सोचा इस नाम की कोई जगह नहीं है तो घूम-फिर के मेरी कविताएं वापस मेरे पास आ जाएंंगी लेकिन एक बार भी उसकी कविता वापस लौट कर उसके पास नहीं आई फिर उसने और कविताएं उस पते पर भेजने लगा लेकिन फिर भी कोई कविता वापस नही आई।

अचानक एक दिन उसके घर एक पत्र आया जिसमें लिखा था कि,"आप बहुत अच्छी कविताएं लिखते हो, मुझे आपकी कविताएं बहुत अच्छी लगीं। आपके अंदर बहुत अच्छा हुनर है मैं आपकी कविताओं को मेरी पुस्तक में प्रकाशित करना चाहता हूँ। क्या आप मुझसे इस पते पर मिल सकते हैं?" और पत्र के पीछे वो पता लिखा था जहाँ उस व्यक्ति ने रामोदास से मिलने को कहा था रामोदास बहुत खुश हुआ कि आखिर किसी ने तो उसकी कविताएं पढ़ी और पढ़ी ही नहीं बल्कि तारीफ भी की और अपनी पुस्तक में प्रकाशित करने की भी बात कही। लेकिन वह इस अचंभे में था कि आखिर ये व्यक्ति है कौन?

दूसरे दिन जब रामोदास उस पते पर गया और उस व्यक्ति को देखा जिसे उसकी कविताएं बहुत पसंद आई थीं,तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि उस जमाने के प्रचलित कवसुमित्रानंदन पंत थे। रामोदास को अपनी आँखों पर

विश्वास नहीं हो रहा था।सुमित्रानंदन पंत जी ने रामोदास से पूछा कि,"जब तुम इतनी अच्छी कविताएं लिखते हो तो तुमने अपनी कविताओं को अखबार में क्यो नहीं छपवाईं" हालांकि पंत जी ने रामोदास की दुखती नस पर हाथ रख दिया था लेकिन रामोदास ने उन्हें सबकुछ बताया कि किस तरह नीची जाति का होने के कारण कोई भी अखबार वाला उसकी कविताओं को अखबार में नही छापता और न ही पढ़ता है।

पंत जी उसकी स्थिति को भाप चुके थे इसलिए उन्होंने उससे और कुछ नही पूछा और सीधा अपने साथ ले गए और पंत जी ने रामोदास की कविताओं को अपनी एक किताब में प्रकाशित कर दीं। उनकी वो किताब बहुत लोकप्रिय हुई जिससे रामोदास को उस किताब के प्रचलन से आर्थिक सहायता मिली। रामोदास ने पंत जी से काफी कुछ सीखा और थोड़े समय के बाद उसने खुद के द्वारा लिखी एक किताब जातिवा" प्रकाशित करवाई और उस किताब के माध्यम से उसने समाज की सबसे बड़ी समस्या जातिवाद के बारे में लिखा कि किस तरह एक नीची जाति के व्यक्ति के साथ व्यवहार किया जाता है। वह किताब बहुत लोगों को पसंद आई।रामोदास ने सुमित्रानंदन पंत जी को अपना गुरु मान कर और किताबें लिखना शुरू कर दिया। अब रामोदास की कवितााएं अखबार मेंं भी छपने लगीं थी।

इस तरह एक गरीब व्यक्ति ने एक अनजान पते से समाज में अपनी जगह बनाई और वो कहते हैं न कि जिंदगी कब पलट जाए कोई भरोसा नहीं, यही रामोदास के साथ हुआ एक अनजान पते ने उसकी जिंदगी ही बदल दी।




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