सुधा ने काँपती आवाज़ में कहा, "हाँ, चाची जी।"
"कहाँ जाओगी इतनी तेज़ बारिश में? चारों ओर हा-हाकार मचा हुआ है," चाची ने उसकी चिन्ता करते हुए कहा।
"हाँ चाची! पर जाना तो पड़ेगा ही। सरकार कहती है कि यह घर मेरा नहीं है।"
"तो फ़िर किसका है?"
"जिनके पास काग़ज़ात हैं। मेरे पास तो कुछ भी नहीं। मैं तो बस दिन-रात दो वक़्त की रोटी कमाने में ही उलझी रह गई।"
"पर घर तो तेरे ही पिता का है!"
"हाँ! है तो। मगर मेरे पास सबूत के तौर पर घर के कागज़ात नहीं हैं।"
"क्यों, कहाँ गए कागज़ात?"
सुधा ने दयनीयता से कहा, "वो कहाँ से लाऊँ चाची? दिन-रात मेहनत करती हूँ, फ़िर भी दो वक़्त की रोटी ही मुश्किल से कमा पाती हूँ। कागज़ों की दौड़-भाग छोड़कर अगर काम पर न जाऊँ, तो भूखे पेट सोना पड़ेगा। इसलिए घर के कामों से हमेशा बाहर ही रही।"
"हाँ, यह तो है। फ़िर अब क्या करोगी, कहाँ जाओगी?" चाची ने दुःखी होकर पूछा।
"जहाँ किस्मत ले जाये। लेकिन यह भगवान का न्याय नहीं है," सुधा मायूसी से बोली।
चाची ने थोड़ा सोचते हुए कहा, "हाँ सुधा, यह तो है। तू ऐसा कर, किसी विधायक या अधिकारी के दफ़्तर में जाकर किसी बड़े अधिकारी से मिलकर बात करके देख ले। शायद तेरा काम बन जाये।"
"वहाँ चक्कर काटूँगी तो रोटी कैसे कमा पाऊँगी? फ़िर तो भूखे पेट ही सोना पड़ेगा।"
"लेकिन बिना छत के इस तूफ़ान में कहाँ रहेगी?"
"जहाँ ईश्वर रखे!"
चाची ने आसमान की तरफ़ देखा और बात टालते हुए बोलीं, "चल ठीक है, चिंटू के पापा आने वाले हैं। मुझे घर का खाना भी बनाना है।"
"जी, चाची जी," सुधा ने भारी मन से कहा।
सुधा वहाँ से आगे बढ़ गई और मन में सोचने लगी— "जब पापा-मम्मी ज़िंदा थे, तो यही लोग मुझ पर कितना प्यार लुटाते थे। खाने को चॉकलेट और मिठाइयाँ देते थे। लेकिन आज जब वे नहीं रहे, तो इन झूठे रिश्तेदारों का असली चेहरा सामने आ गया। ये सब मिलकर कोर्ट-कचहरी में गवाही क्यों नहीं दे देते कि मैं ही शर्मा जी की इकलौती वारिस हूँ?"
"चार कमरों का इतना बड़ा घर होते हुए भी, आज मैं बेघर हो गई हूँ---। कितने निर्दयी हैं-- ये लोग, जो मुझे अपने ही घर के एक छोटे से कमरे में भी नहीं रहने दे रहे। अब कहाँ जाऊँगी मैं---? जब अपने ही जानने वाले लोग पराए हो गए, तो अनजान दुनिया मेरे साथ क्या करेगी?"
यही सब सोचती हुई सुधा आँखों में आँसू लिए धीरे-धीरे अँधेरे और बारिश में आगे निकल गई। अपनी तक़दीर से लड़ने की ताक़त अब उसमें नहीं बची थी।
अब भी चाची की कही बातें उसके जेहन में गूँज रही थी। न्याय की आस लेकर विधायक के दफ्तर ही तो गई थी, उस दिन!
उसे आज भी वो दिन याद आ रहा था, जब वह किसी के कहने पर अपने यहाँ की पार्षद से मिलने गई थी। पहले तो पार्षद ने मिलने से मना कर दिया था। लेकिन जब उनके सहायक ने उनके कान में कुछ कहा, तो उन्होंने तुरंत उसे अंदर बुला लिया।
"हाँ, तो तुम्हारा नाम सुधा है।"
"जी, मैं सुधा हूँ। घर में मुझे सब बबली कहते थे। वैसे मेरा नाम सुधा शर्मा है।"
"अच्छा, तो तुम्हारे पास कोई प्रूफ़ है, कि तुम ही सुधा हो, शर्माजी की बेटी।"
"जी-- जी नहीं।"
"फ़िर हम कैसे मान लें, कि तुम ही शर्माजी की बेटी हो!"
"पर सच तो यही है। मोहल्ले के सारे पड़ोसी जानते हैं मुझे।"
"क्या वो लोग तुम्हारे लिए गवाही देंगे?"
"पता नहीं।"
"तब तो बहुत मुश्किल है।"
फिर कुछ सोचते हुए— "हाँ, एक उपाय है।"
सुधा ने उत्सुकता से पूछा— "जी! उसके लिए मुझे क्या करना पड़ेगा?"
"अरे, ज्यादा कुछ नहीं। केवल कुछ घंटों के लिए तुम्हें पुलिस अधिकारी वर्मा जी के घर जाना पड़ेगा।"
सुधा खुश होकर बोली— "जी, मैं चली जा ऊँगी। उनके घर बर्तन, झाड़ू-पोछा, खाना बनाना... मैं सब कर दूँगी।"
"अरे, यह सब नहीं। उनके साथ सोना पड़ेगा, बस थोड़ी देर।"
"क्या--?" वह गुस्से व नफ़रत से काँपने लगी।
उसने लगभग तेज़ चिल्लाकर कहा था--
"आप एक औरत होकर भी ऐसी बातें कैसे कर सकती हैं?"
उसका पूरा चेहरा आँसुओं से भीग चुका था। वह जल्दी से पलटकर कमरे से बाहर की तरफ़ भागती चली आई। बाहर निकलते-निकलते उसके कानों में पार्षद के हँसने की आवाज़ और "बड़ी आई सती-सावित्री बनने..." जैसे ताने पड़े, जिन्होंने उसे भीतर तक तोड़ दिया। इसके बाद, वह लौटकर फिर किसी के पास नहीं गई।
जब एक महिला पार्षद ही उसकी मजबूरी और स्वाभिमान का सौदा कर सकती थी, तो वह किसी और पर कैसे भरोसा करती! लेकिन उस दिन के बाद से उसने रोना बंद कर दिया और ठान लिया कि वह अपनी लड़ाई खुद लड़ेगी।
लेकिन पैसों की तंगी और पेट की भूख ने जल्द ही उसके लड़ने के जज़्बे को दिल के किसी कोने में दफ़न कर दिया। यही सब सोचते हुए सुधा अपने भीगे शरीर और आँसुओं से बोझिल पलकों के साथ, कदम-कदम घसीटते हुए आगे बढ़ी चली जा रही थी।
तेज़ बारिश और खाली पेट के कारण उसका सिर चकराने लगा और वह सड़क किनारे एक बंद दुकान के शेड के नीचे बेहोश होकर गिर पड़ी।
जब सुधा की आँख खुली, तो उसने खुद को एक साफ-सुथरे कमरे में पाया। उसने घबराकर इधर-उधर देखा। पास ही एक बुजुर्ग दंपत्ति बैठे थे। वे सामाजिक कार्यकर्ता आकाश सिंह और उनकी पत्नी शैलजा सिंह थीं, जो उस क्षेत्र की एक जानी-मानी वकील थीं।
उन्होंने सुधा को पानी दिया और उसके इस हाल में होने का कारण पूछा। सुधा ने रोते हुए अपनी पूरी आपबीती और रिश्तेदारों की निष्ठुरता के बारे में उन्हें बता दिया। यह सुन आकाश सिंह ने ढाँढस बँधाते हुए मुस्कुराकर कहा, "सुधा बेटा! कानून सिर्फ कागज़ नहीं, सच भी देखता है। तुम्हारे पापा शर्मा जी के नाम पर वह घर था, यह बात पूरे मोहल्ले को पता है। तुम उनकी इकलौती संतान हो, इसलिए कानूनी तौर पर तुम ही उनकी वारिस हो। कागजात गुम होने से तुम्हारा हक खत्म नहीं हो जाता।"
उन्होंने शैलजा सिंह से बिना कोई फीस लिए सुधा का केस लड़ने का अनुरोध किया। जल्द ही, शैलजा जी ने तहसील कार्यालय से पुरानी फाइलें निकलवाकर शर्मा जी के नाम की रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) हासिल कर ली। इसके साथ ही, उन्होंने मोहल्ले के कुछ ईमानदार बुजुर्गों को गवाह बनाया, जिन्होंने कोर्ट में गवाही दी कि सुधा ही शर्मा जी की इकलौती संतान है। अदालत ने सुधा के पक्ष में फैसला सुनाया और पुलिस की मदद से उसे उसके चार कमरों के घर का कब्ज़ा वापस दिलवा दिया।
यही नहीं, शैलजा जी ने उस भ्रष्ट महिला पार्षद के खिलाफ भी पद के दुरुपयोग और मानसिक उत्पीड़न का मामला दर्ज करवाया। नतीजा यह हुआ कि कोर्ट के आदेश पर पार्षद को न सिर्फ अपनी कुर्सी गँवानी पड़ी, बल्कि उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी। "बड़ी आई सती-सावित्री बनने..." कहने वाली पार्षद आज खुद कानून के सामने बेनकाब हो चुकी थीं।
दूसरी तरफ, धोखेबाज़ रिश्तेदारों के चेहरे उतर गए थे। आज सुधा अपने माता-पिता के घर के आँगन में खड़ी थी। चाची आज फिर उसके पास आई थीं, लेकिन इस बार उनके हाथों में मिठाई का डिब्बा था और चेहरे पर वही पुराना लालच।
सुधा ने मुस्कराकर मिठाई ली, पर इस बार वह लाचार सुधा नहीं थी। उसने चाची की आँखों में आँखें डालकर कहा, "चाची जी! भगवान का न्याय देर से ही सही, लेकिन दुरुस्त होता है। अब मुझे खाना बनाना है, आप जा सकती हैं।" सुधा ने अपने घर का दरवाज़ा बंद कर लिया। उसने न सिर्फ अपना घर वापस पा लिया था, बल्कि समाज से अकेले लड़ने का आत्मविश्वास भी जीत लिया था।
By Pratima Devi
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