खिड़की से झाँकता-डर!
खिड़की से झाँकता-डर!
( बच्चों के व्यवहार में आए बदलाव को पहचानें। आपकी एक सजगता उन्हें बड़े खतरे से बचा सकती है।
हर बच्चे का अधिकार है एक सुरक्षित माहौल, जहाँ डर की खामोशी नहीं, खिलखिलाती मुस्कान हो।
"बचपन सुरक्षित तो देश सुरक्षित।" )
नौ साल का मृदुल रोज़ शाम को घर लौटते समय अपने कदम धीमे कर लेता था। गली का वह कोना और वहाँ खड़ी टोनी की डरावनी आँखें उसका दम घोंट देती थीं। मृदुल के माता-पिता सुबह अँधेरे में काम पर निकल जाते थे। तंबू के उस छोटे से इलाके में मृदुल अकेला रह जाता था, और इसी अकेलेपन का फायदा टोनी उठा रहा था।
सुबह-सुबह जब उसके माता -पिता काम पर चले गए , तो मृदुल फिर डर के साए में अकेला रह गया। आज उसका मन बहुत उदास था। घबराहट में दम घुट रहा था और आँखें भारी हो रही थीं। वह सोचने लगा, 'हमेशा जिंदगी यूँ ही क्यों परेशान करती है? क्या आज भी कुछ बुरा होने वाला है?' फिर वह खुद से ही बोला, "नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए। मैं अब और नहीं सह पाऊँगा। मुझमें अब हिम्मत नहीं बची। हे भगवान! मुझे इस डर से बचा लो। प्लीज़ भगवान, जो भी हो, मुझे इससे लड़ने की ताक़त ज़रूर दे देना।"
मृदुल सहमा-सा हाथ जोड़कर घर के पास वाले मंदिर के द्वार पर बैठा प्रार्थना करते हुए बुदबुदा रहा था। हमेशा की तरह आज भी सुबह-सुबह घर की खिड़की से झाँकती टोनी की दो आँखें! उसे डरा रही हैं।
तभी सामने से आते डा० वर्मा ने मृदुल को आवाज देकर कहा, "मृदुल, यहाँ क्यों बैठे हो ? आज स्कूल नहीं जाना क्या?"
मृदुल ने अटकते हुए जवाब दिया - "जाना है साहब।"
'
''तो जाओ जल्दी। स्कूल का समय हो गया है। देर हो जायेगी वरना।''
''जी, साहब।''
कहता हुआ मृदुल जल्दी से दौड़ता हुआ मंदिर की सीढ़ियाँ उतर गया।
डा० वर्मा और उनके साथी डा० पाण्डेय जी के अथक प्रयासों से अपवंचित वर्ग के बच्चे भी अब स्कूल जाने लगे थे।
ऐसा नहीं था कि ये बच्चे पढ़ना नहीं चाहते थे। लेकिन माँ-बाप की मजबूरी और गरीबी ने उन्हें हमेशा स्कूल से दूर रखा था।
मृदुल हाँफते हुए अपनी कक्षा में पहुँचा, तो गुरुजी ने प्यार से बुलाकर देर से आने का कारण पूछा। मृदुल नज़रें झुकाए चुप खड़ा रहा। गुरुजी के बार-बार पूछने पर मृदुल ने बताया कि वह मंदिर चला गया था। वहीं देर हो गई।
गुरुजी ने मृदुल को अपनी जगह पर बैठने को कहा। लेकिन उनकी पारखी नज़रें मृदुल की ख़ामोशी को पहचान गयीं। क्योंकि आज फिर मृदुल की कॉपियों पर आँसुओं के निशान थे। गुरुजी ने जब उसका उदास चेहरा देखा, तो उन्हें समझ आ गया कि इस मासूम के दिल में कोई गहरा डर छुपा है।"
छुट्टी होने पर गुरुजी ने मृदुल को अपने पास बुलाया और प्यार से पूछा--
तब मृदुल अपने मन के डर को छिपा नहीं पाया और रो पड़ा। गुरुजी ने पूरी बात बताने को कहा।
तो मृदुल रोते हुए बताने लगा -
''गुरुजी! मैं----मैं--मैं----मुझे बहुत डर---- मैं---- डर रहा हूँ।''
''क्यों---- किससे---- डर रहे हो?'' गुरुजी अचरज से बोले।
''वो---- टोनी----'' मृदुल सहमा-सा बोला।
"कौन टोनी ?"
"वो जो मेरे तम्बू के पास रहता है--"
"क्यों डर रहे हो उससे--"
"वो बहुत गन्दा आदमी है गुरुजी--"
"कैसा गन्दा--"
"वो-- वो--
वो-- वो-- वो..." कहते-कहते मृदुल फूट-फूटकर रोने लगा और गुरुजी के गले से लग गया।
गुरुजी ने उसकी पीठ थपथपाई, उसे पानी पिलाया और शांत कराया। जब मृदुल थोड़ा संभला, तो उसने सिसकते हुए बताया,
"गुरुजी, टोनी मुझे अकेले में बुलाता है। मना करने पर मारता है और गलत तरीके से छूता है। कहता है कि किसी को बताया तो जान से मार देगा। मैं बहुत डर गया हूँ गुरुजी।"
मृदुल की बात सुनकर गुरुजी का दिल दहल गया। गुस्से और दुख से उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने तुरंत 9 साल के उस मासूम मृदुल को कसकर गले से लगा लिया और कहा,
"मृदुल, तुम बहुत बहादुर बच्चे हो कि तुमने यह बात मुझे बताई। अब तुम्हें उस गंदे आदमी से डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। तुम्हारे गुरुजी हमेशा तुम्हारे साथ हैं।"
गुरुजी ने बिना एक पल गंवाए डॉक्टर वर्मा को फोन करके तुरंत स्कूल बुलाया। डॉक्टर वर्मा ने जब मृदुल की आपबीती सुनी, तो उनका भी खून खौल उठा। उन्होंने तुरंत ही बाल कल्याण समिति और स्थानीय पुलिस स्टेशन को इस घिनौने अपराध की सूचना दी।
शाम होते-होते पुलिस की एक टीम सादे कपड़ों में मृदुल के तम्बू वाले इलाके में पहुँच गई। जैसे ही टोनी ने हमेशा की तरह मृदुल को अकेले देखकर डराने की कोशिश की, पुलिस ने उसे रंगे हाथों दबोच लिया। जब पुलिस उसे घसीटते हुए गाड़ी में डाल रही थी, तो पूरे इलाके के लोग जमा हो गए।
मृदुल के माता-पिता भी काम से लौट चुके थे। जब डॉक्टर वर्मा ने उन्हें टोनी की करतूत बताई, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मृदुल की माँ फूट-फूटकर रोने लगी और दौड़कर मृदुल को छाती से लगा लिया। वह रोते हुए बोली, "मुझे माफ़ कर दे मेरे बच्चे! हम पेट पालने की मजबूरी में इतने अंधे हो गए कि तेरा यह दर्द देख ही नहीं पाए।"
मृदुल के पिता ने नम आँखों से गुरुजी और डॉक्टर वर्मा के आगे अपने हाथ जोड़ लिए और कहा, "अगर आज आप लोग न होते, तो मेरा बच्चा अंदर ही अंदर घुटकर मर जाता। आपने उसे नई ज़िंदगी दी है।"
गुरुजी ने उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा, "बच्चों की सुरक्षा हमारी पहली ज़िम्मेदारी है। अब मृदुल बिल्कुल सुरक्षित है।"
टोनी अपने कुकर्मों के कारण सलाखों के पीछे था। अगले दिन की सुबह बिल्कुल अलग थी। सूरज की किरणें आज तीखी नहीं, बल्कि सुकून भरी लग रही थीं। मृदुल ने जब खिड़की से बाहर झाँका, तो वहाँ कोई डरावनी आँखें नहीं थीं। वहाँ सिर्फ खुली धूप और हवा थी।
मृदुल ने राहत की एक लंबी साँस ली। उसका दम घुटना अब बंद हो चुका था। माँ ने आज उसे प्यार से चूमकर दलिया खिलाया और पिता खुद उसे स्कूल छोड़ने आए। मृदुल ने हाथ हिलाकर अपने माता-पिता को अलविदा कहा और खुशी-खुशी दौड़ता हुआ स्कूल के अंदर चला गया। आज उसके चेहरे पर डर की खामोशी नहीं, बल्कि एक आज़ाद बच्चे की सच्ची मुस्कान थी।
By Pratima Devi
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