अमर प्रेम
अमर प्रेम
कहानी की शुरुआत एक छोटे से गाँव से होती है, जहाँ सूरज की पहली किरणों के साथ नीला आसमान और हरे भरे खेतों की सुंदरता निखर आती है। यहीं पर रहते थे कृष्णदत्त और सिया, बचपन के दोस्त जो एक-दूसरे को अपनी जान से भी ज्यादा चाहते थे। कृष्णदत्त के लिए सिया उसकी दुनिया थी, और सिया के लिए कृष्णदत्त उसकी खुशियों का खजाना।
एक दिन, जब कृष्णदत्त और सिया गाँव के पास के एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठे थे, सिया ने कृष्णदत्त से पूछा, “क्या तुम मुझे हमेशा ऐसे ही प्यार करोगे?”
कृष्णदत्त ने मुस्कुराते हुए कहा, “सिया, मेरा प्यार तुम्हारे लिए अनंत है। ये कभी खत्म नहीं होगा।” सिया के चेहरे पर मुस्कान छा गई, और दोनों ने उस पल को मन ही मन संजो लिया। यह उन दिनों में से एक था जब उन्हें पता नहीं था कि उनकी ज़िंदगी एक बनने जा रही है।
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, उनके प्यार की गहराई बढ़ती गई। परंतु, हर प्रेम कहानी की तरह, उनकी कहानी में भी एक मोड़ आया। कृष्णदत्त के पिता ने उसे शहर जाकर पढ़ाई करने का फैसला किया। कृष्णदत्त के लिए यह एक कठिन समय था, लेकिन उसने सिया से वादा किया कि वह जल्दी ही लौट आएगा। यह वादा उनके रिश्ते का एक अहम हिस्सा बन गया और का आरंभ बन गया।
कृष्णदत्त के जाने के बाद, सिया हर रोज उस पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर उसकी राह देखती रही। वह दिन-रात बस कृष्णदत्त के वापसी का इंतजार करती थी। उसने अपने दिल से कभी भी जैसी त्रासदी की कल्पना नहीं की थी। लेकिन हर गुजरते दिन के साथ उसकी आँखों की चमक कम होती जाती थी।
शहर में, कृष्णदत्त ने अपनी पढ़ाई में खुद को व्यस्त कर लिया, लेकिन उसकी आत्मा का एक हिस्सा हमेशा सिया के साथ गाँव में ही था। वह हर रोज उसे पत्र लिखता, लेकिन एक दिन जवाब नहीं आया। उसने सोचा कि सिया नाराज़ हो गई है, लेकिन वह नहीं जानता था कि सिया के जीवन में एक तूफान आने वाला है। यह तूफान उनकी को और भी गहरा बना देगा।
गाँव में, सिया के माता-पिता ने उसकी शादी तय कर दी थी। सिया ने बहुत विरोध किया, लेकिन परिवार के दबाव में आकर उसने अपने प्यार का बलिदान दे दिया। कृष्णदत्त को यह खबर बाद में मिली, जब वह गाँव लौटने की तैयारी कर रहा था। उसके लिए यह एक की तरह था, जिसे वह कभी लिखना नहीं चाहता था। उसने महसूस किया कि उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी उससे दूर जा रही है।
कृष्णदत्त ने गाँव पहुंचकर देखा कि सिया की शादी हो चुकी है। उसने सिया से मिलने की कोशिश की, लेकिन सब व्यर्थ था। वह पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर रोया, जहाँ उन्होंने अपनी अनगिनत यादें बनाई थीं। यह वह स्थान था जो उनकी का मूक गवाह बन गया था।
समय बीतता गया, लेकिन कृष्णदत्त का प्यार कभी कम नहीं हुआ। वह अक्सर उस पीपल के पेड़ के पास जाता और अपनी अधूरी प्रेम कहानी को याद करता। सिया की यादें उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी थीं। वह जानता था कि यह एक है, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। उसने अपने प्यार को अपने दिल में संजोकर रखा, जैसे कि वह एक अनमोल खजाना हो।
कुछ वर्षों बाद, कृष्णदत्त ने सुना कि सिया की शादी सफल नहीं रही। वह उससे मिलने गया, लेकिन इस बार सिया ने ही उसे रोक दिया। उसने कहा, “कृष्णदत्त, हमारा प्यार हमेशा अमर रहेगा, लेकिन हम अब साथ नहीं हो सकते।”
कृष्णदत्त ने सिया की आँखों में देखा और कहा, “सिया, तुम्हारा प्यार मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ताकत है। मैं हमेशा तुम्हारे लिए खुश रहना चाहता हूँ।” यह सुनकर सिया की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन वह जानती थी कि उनकी का यही अंत था।
इस तरह, कृष्णदत्त और सिया की कहानी एक अधूरी प्रेम कहानी बन गई, जिसे लोग के नाम से जानते हैं। उनका प्यार भले ही अधूरा रह गया हो, लेकिन उनकी यादें हमेशा जीवित रहेंगी। यह कहानी बताती है कि सच्चा प्यार कभी खत्म नहीं होता, भले ही परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।
कृष्णदत्त ने अपने जीवन को सिया की यादों के साथ बिताने का फैसला किया। उसने उस पीपल के पेड़ के नीचे एक छोटा सा मंदिर बनवाया, जहाँ वह हर रोज आकर सिया के लिए प्रार्थना करता। यह मंदिर उनकी का प्रतीक बन गया, जहाँ लोग आकर उनके अमर प्रेम की कहानी सुनते और सीखते कि सच्चा प्यार कभी नहीं मरता।
सिया और कृष्णदत्त की कहानी एक प्रेरणा बन गई, जो लोगों को सिखाती है कि प्यार की ताकत असीमित होती है। उनकी ने कई दिलों को छुआ और यह साबित किया कि प्रेम की यादें समय की सीमा से परे होती हैं। कहानी का यह अंत सिया और कृष्णदत्त के अमर प्रेम की गवाही देता है, जो समय की रेत पर अपनी अमिट छाप छोड़ गया।
