अजीब सा रिश्ता
अजीब सा रिश्ता
आज दिन मंगलवार, तारीख 22/05/2019, सुबह की शुरुआत एक नयी आशा के साथ, मन में हजारों उधेड़ बुन और उलझी हुई मेरी बीती हुई जीवन की कुछ यादों के साथ हुई। मैं अपना नाश्ता करके अपने ट्यूशन के लिए निकल पड़ा। वहीं जहां रोज़ मैं अपने दोस्तों से भी मिल आता हूं। जिनमें से एक को नया -नया प्यार का खुमार चढ़ा हुआ है, और जो अपने चाहने वाली को अपने दिल की बात बताने में तीसरे दिन असफल हुआ। उसे देखकर मुझे अपने वो दिन याद आ जाते है जब मैं भी उसी की तरह का हुआ करता था। आज अपने दोस्त को देखकर शायद एक उम्मीद के साथ मैंने उससे यानी अपनी प्रेमिका से बात करने का विचार किया। वो, जो मेरे सामने वाली गली के चार घर छोड़कर रहती है, जो कभी-कभी अपनी छत पर आ जाया करती है या कभी- कभी अपने घर के सामने सर पर दुपट्टा रखें मिल जाती है। उससे आज मैंने बात करने की सोची। बात करने का स्थान हमारा घर ही था तो मैं अपने सभी ट्यूशन पढ़कर अपने घर की तरफ चल पड़ा। मैंने बस में बैठे हुए न जाने हजारों ख़्वाब देख लिए थे। इस सफर का तो आज जैसे पता ही नहीं चला। मैं अपने घर पहुंचा, शाम का समय था। हल्की धूप खिली हुई थी, सूरज अपने विदाई के समय पर था। मैं उसे जाकर अपने मन की बात को बताने का विचार करके घर से निकल गया। मैं जैसे ही अपने घर के बाहर के दरवाज़े पर आया तो वो इत्तेफ़ाक से सामने ही खड़ी थी। उस समय मैं मानो संसार के सबसे प्रसन्न प्राणियों में से एक था। थोड़ी घबराहट ज़रूर हो रही थी पर हिम्मत करके मैं अपने साहस को जुटाते हुए उसके पास गया और मन में सोचा कि कहीं कुछ उल्टा-पुल्टा न हो जाए। मैंने डरते डरते उसे अपने दिल की बात बताने की कोशिश की पर यह साला दिल और डर बड़े कमिने होते हैं जो बात को मुंह तक आने नहीं देते। मैंने सोचा कि अगर मैं आज नहीं कर पाया तो शायद फिर कभी नहीं कर पाऊंगा। मैंने हिम्मत करके उससे थोड़ी इधर उधर की बातें करके अपने मन की बात जाहिर कर दी। मेरे प्यार के इज़हार करने के तुरंत बाद चारों तरफ शांति थी। मेरे मुंह से ये सब सुनने के बाद वो मुझ पर गुस्सा हो गई और वहां से चली गई। मेरा मन उसको पकड़ कर यह पूछने का हुआ कि अब मुझ में ऐसा क्या नहीं है जो उसे पहले बहुत पसंद हुआ करता था ।
मैं ऐसा कुछ नहीं कर सका और मेरा मन उसे गाली देने का हुआ लेकिन मन में निराशा लिए मैं वापस घर आ गया था।
मैं घर पर अपनी छत पर परेशान होकर यह सोच रहा था कि आखिर वो इतनी ख़ुदग़र्ज़ कैसे हुई ? मेरा मन मानने को तैयार नहीं हो रहा था कि मैंने उसके साथ और उसने मेरे साथ आज यह सब कर दिया। कैसे बदल सकते हैं वह ? वास्तव में मुझे इसका ज़रा भी अंदाजा नहीं था। बात उन दिनों की है जब मैं अपने एक दोस्त के यहां पर मिलने जाया करता था, तो वह अक्सर वहां आ जाया करती कुछ दिनों में ही हमारे बीच अच्छी दोस्ती हो चुकी थी। एक ऐसी दोस्ती जो शायद हम दोनों में से कोई भी पूरे जीवन भर तोड़ना नहीं चाहते थे हम धीरे-धीरे बीते हुए समय के साथ अपनी बातें और अपनी फीलिंग्स एक दूसरे के साथ शेयर करने लगे। अब बात शायद दोस्ती से बढ़कर प्यार में बदल चुकी थी। वह भी मुझे पसंद करने लगी थी तभी तो मुझे मेरे दोस्त के यहां पर बुला कर बातें किया करती थी, हमारे घर वाले सोचते थे कि हम अपने दोस्त के यहां पर केवल मिलने के लिए जाते थे और वहां हम एक दूसरे की उन बातों को एक दूसरे के साथ शेयर करते थे जिनसे शायद हमें जीवन और प्यार नाम की किसी चीज का एहसास होने लगा था। उसने भी कई बार मुझसे प्यार का इज़हार करने की कोशिश की थी। पर शायद घबराहट की वजह से नहीं बोल पाई थी। एक दिन मैंने ही उसे अपने दिल की बात बताई तो वह बोली कि "ऐसा मत सोचों मैं उस तरह की लड़की नहीं हूं" उसने यह बात अपनी मम्मी से बता दी पर शायद किस्मत सही होने के कारण कुछ गड़बड़ नहीं हुई। मैंने सोचा था कि कुछ दिनों बाद सब ठीक होगा तो मान जाएगी। आज पाँच साल हो चुके हैं पता ही नहीं चला कि सब कुछ ठीक होने में इतना समय कैसे निकल गया। आज मैंने एक बार फिर जानना चाहा तो उसका जवाब आज भी बिल्कुल अब से पाँच साल वाले जवाब की तरह ही था।
आज जाकर एहसास हुआ, कि वाकई सच्चे प्यार को कोई भी समझ कर भी समझ नहीं पाता। न जाने क्यों एक ऐसे इंसान के लिए हम अपना सब कुछ भूलकर ,सबकुछ पीछे छोड़कर इतना समय कहाँ से निकाल लेते है जो शायद कभी हमारा होने का दावा किया करता था अपने उन ख्वाबों को भूल कर उसके लिए कुछ भी, किसी भी हद तक करने के लिए तैयार हो जाते हैं, हम अपने जीवन के उन महत्वपूर्ण पलों को भूलकर केवल और केवल उनके ही विचारों में रहने लगते है जिन्हे हमारी ज़रा भी परवाह नहीं होती। और आज भी शायद यही कारण था कि मैं रात को बैठा हुआ उसके बारे में लगातार सोचे ही जा रहा था जो कभी मुझे समझ ही नहीं पाया या यूं कहें जो मुझे समझने का दिखावा किया करता था, जिसे मैंने शिद्दत से प्यार किया था वह आज मुझे एक बार फिर ठुकरा कर चली थी मेरे उन सभी ख्वाबों को एक झटके में तोड़ कर चली गई थी जिन्हें मैंने उसके साथ बिताने क्या सपना देखा था।
बस इतनी सी थी मेरी कहानी ।
Written by-- Àshish Singh

