अब पछताये होत क्या
अब पछताये होत क्या
पहले गाँव और फिर छोटे से शहर में पली बढ़ी लड़की मानसी की शादी एक महानगर में हो जाती है। शुरु में तो उसको भी सबके साथ सामंजस्य बिठाने में बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
फिर धीरे-धीरे मानसी ने अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लिया, पति का प्यार और सहयोग तो उसके साथ हमेशा से था। मानसी के मायके में भी सब उसको खुश देखकर सन्तुष्ट थे। मायका दूर होने की वजह से वो साल में एक या दो बार ही जा पाती थी।
इधर मानसीअपने घर-परिवार में व्यस्त होती गई और उधर उसकी माँ अकेली पड़ती जा रही थी क्योंकि उनके जीने का सहारा तो सिर्फ मानसी थी। मानसी के पिता का देहांत तो उसके बचपन में ही हो गया था। माँ ने ही उसे अकेले पाला था।
इधर मानसी के ससुराल में भी सभी देवर, ननदों की शादियां हो गयीं। ननदें अपनी ससुराल और देवर अपनी पत्नियों के साथ दूसरे शहरों में नौकरी के लिए चले गये।
उसके खुद के बच्चे भी घर से बाहर पढाई करने चले गये। अब मानसी को अपनी माँ बहुत याद आती है, माँ की कही हुई सारी बातें याद करके वो दुःखी होती है। माँ जब भी कभी फोन करती या मिलती तो अपने अकेलेपन के बारे में या घरवालों के बारे में कोई भी बात करती तो मानसी हमेशा झल्ला के बोलती की ये बेमतलब की बातें मत करो मुझसे और माँ हमेशा ये बोल कर की जब नहीं रहूंगी तब पता चलेगा अपनी बात खत्म कर देती थी।
अब जब माँ सच में नहीं है और मानसी खुद भी अपने बच्चों के बगैर रह रही है तो उसे अब अपनी माँ की मनोदशा का एहसास हो रहा है लेकिन वो कहते हैं ना "अब पछताये होत का"।
