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Krishna Thakur

Horror

4  

Krishna Thakur

Horror

4 किलोमीटर आम का पेड़

4 किलोमीटर आम का पेड़

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गांव की पक्की सड़क जहां खत्म होती थी, वहां से ठीक चार किलोमीटर आगे एक सन्नाटा पसरा हुआ कच्चा रास्ता शुरू होता था। उसी मोड़ पर खड़ा था वह सौ साल पुराना आम का पेड़। तना इतना विशाल कि तीन लोग मिलकर भी अपनी बांहों में न समेट पाएं, और शाखाएं इतनी फैली हुई कि दोपहर की चिलचिलाती धूप में भी उसके नीचे गहरा, स्याह साया रहता था। पूरे इलाके में उस पेड़ को लेकर अजीब-अजीब बातें मशहूर थीं। दोपहर के वक्त भी जब कोई वहां से गुजरता, तो मौसम चाहे कितना भी गर्म हो, वहां पहुंचते ही बदन में एक ठंडी सिहरन दौड़ जाती थी। शाम ढलते ही उस रास्ते पर परिंदे भी चहकना बंद कर देते थे और सन्नाटा इतना गहरा हो जाता था कि अपनी ही सांसों की आवाज सुनाई देने लगती थी।
​बात जून के महीने की है। उमस इतनी थी कि कमरे के अंदर सांस लेना भी भारी लग रहा था। ऊपर से पूरे गांव की बिजली गुल हो गई थी। पंखे शांत पड़े थे और छत की तपिश नीचे उतर रही थी। रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। गर्मी और बेचैनी से तंग आकर मैंने अपने दोस्त रोहन को आवाज दी। रोहन ने अपनी पुरानी साइकिल निकाली और आगे हैंडल पर एक टॉर्च कसकर बांध दी। इरादा बस इतना था कि खुली हवा में साइकिल चलाते हुए उस चार किलोमीटर दूर वाले मोड़ तक का चक्कर लगाकर लौट आएंगे। साथ में हमने ठंडे पानी की बोतलें ले लीं।
​सड़क पर सन्नाटा था। साइकिल के पैडल की धीमी खड़खड़ाहट और रात के कीड़ों की आवाज के अलावा दूर-दूर तक कोई आहट नहीं थी। हल्की चांदनी रात थी, पर जैसे-जैसे हम उस पुराने पेड़ के करीब पहुंचे, सड़क किनारे की झाड़ियों से आने वाली आवाजें बिल्कुल बंद हो गईं। माहौल में एक अजीब सा भारीपन महसूस होने लगा।
​पेड़ के नीचे पहुंचते ही ऐसा लगा मानो तापमान अचानक कई डिग्री नीचे गिर गया हो। वहां चांदनी का एक कतरा भी जमीन तक नहीं पहुंच पा रहा था। हवा में भीगी मिट्टी और पके हुए पत्तों की एक अजीब सी गंध घुली हुई थी। रोहन ने साइकिल को पेड़ की एक मोटी जड़ के सहारे खड़ा कर दिया और हम दोनों सुस्ताने के लिए वहीं पास में बैठ गए।
​रोहन ने माहौल को हल्का करने के लिए अपना फोन निकाला और कहा कि इस सन्नाटे की एक तस्वीर लेते हैं। जैसे ही उसने कैमरा चालू किया, स्क्रीन बुरी तरह से झिलमिलाई और फोन पूरी तरह बंद हो गया। जब उसने रीस्टार्ट करने की कोशिश की, तो स्क्रीन पर अजीब सी लकीरें उभरीं और फिर स्क्रीन काली पड़ गई। हमने इसे फोन की खराबी समझा।
​वहां बैठे हमें मुश्किल से दस मिनट हुए होंगे कि अचानक हवा पूरी तरह थम गई। पत्तों की हल्की सरसराहट भी बंद हो गई। तभी हमारे सिर के ठीक ऊपर से टप... टप... की आवाज आई। ऐसा लगा जैसे डालियों से कुछ गिर रहा हो। मैंने जमीन पर हाथ फेरा तो उंगलियों में एक सख्त, कच्चा आम आया। रोहन ने साइकिल पर बंधी टॉर्च को घुमाकर ऊपर की तरफ रोशनी की। टॉर्च की पीली रोशनी में जो दिखा, उसने हमारी रीढ़ में सिहरन पैदा कर दी—पेड़ की किसी भी डाल पर बौर या फल का नामोनिशान नहीं था। पूरी तरह खाली शाखाएं थीं, फिर भी जमीन पर लगातार फल गिरने की आवाजें आ रही थीं।
​रोहन के हाथ से टॉर्च की रोशनी फिसलकर तने के पिछले हिस्से की तरफ गई। रोशनी के उस दायरे में दो परछाइयां साफ नजर आईं। वे इंसानों जैसी थीं, बिल्कुल शांत और स्थिर। एक परछाई काफी लंबी थी और दूसरी किसी छोटे बच्चे जितनी। ताज्जुब की बात यह थी कि उनके पैर जमीन को छू नहीं रहे थे, बल्कि सतह से दो-तीन इंच ऊपर हवा में ठहरे हुए थे। दोनों के चेहरे अंधेरे में डूबे थे, लेकिन यह साफ महसूस हो रहा था कि उनकी नजरें सीधे हम पर टिकी हैं।
​हमारे गले सूख गए। तभी पेड़ की सबसे ऊंची डाली से पत्तों के आपस में रगड़ने जैसी आवाज आई, जो धीरे-धीरे एक भारी फुसफुसाहट में बदल गई—"चार... किलोमीटर... वापस... जाओ..."
​उस पल हमें सोचने या समझने का मौका नहीं मिला। रोहन ने झटके से साइकिल उठाई, पैडल पर पैर मारा और हम दोनों पूरी ताकत से उस कच्चे रास्ते पर उल्टे पैर भागे। चार किलोमीटर का वह रास्ता ऐसा लग रहा था मानो कभी खत्म ही नहीं होगा। पीछे कदमों की आहट नहीं थी, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य दबाव हमारे साथ-साथ चल रहा हो।
​हाँफते हुए जब हम अपने घर के दालान में पहुंचे और भीतर से दरवाजा बंद किया, तब जाकर सांस में सांस आई। सब कुछ शांत हो चुका था। लेकिन लगभग दो मिनट बाद ही मुख्य लकड़ी के दरवाजे पर बाहर से तीन बार धीमी पर साफ दस्तक हुई—ठक... ठक... ठक...। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उठकर कुंडी खोले।
​सुबह जब सूरज की पहली किरण के साथ डर थोड़ा कम हुआ और हमने दरवाजा खोला, तो चौखट के ठीक बाहर दो बिल्कुल ताजे, कच्चे आम रखे हुए थे। उन पर किसी धारदार चीज से बने खरोंच जैसे गहरे लाल निशान थे।
​बाद में जब हमने गांव के एक बुजुर्ग से इस बारे में बात की, तो उन्होंने एक पुरानी घटना बताई। करीब पच्चीस साल पहले उसी पेड़ के पास से गुजर रही हाई-टेंशन बिजली की लाइन टूटकर गिर गई थी, जिसकी चपेट में आकर गांव की एक मां और उसका बेटा शांत हो गए थे। उसके बाद कई बार प्रशासन ने उस पेड़ को सड़क चौड़ी करने के लिए हटाने की कोशिश की, लेकिन जब भी कुल्हाड़ी या आरी उस तने पर चलती, औजार मुड़ जाते या टूट जाते। आखिरकार उस हिस्से को वैसे ही छोड़ दिया गया।
​उस रात के बाद से हम कभी रात में उस रास्ते की तरफ नहीं गए। लेकिन कल शाम जब मैं अपनी गाड़ी से शहर से लौट रहा था और चार किलोमीटर का वही मील का पत्थर पार हुआ, तो गाड़ी का इंजन अचानक खुद-ब-खुद बंद हो गया। हेडलाइट की मंद रोशनी जब उस पेड़ की सबसे निचली डाल पर पड़ी, तो वहां बिल्कुल बीच में दो कच्चे आम लटके हुए थे, जबकि उस मौसम में पूरे इलाके के पेड़ों से फल कब के खत्म हो चुके थे। चारों तरफ सन्नाटा था और वह डाल बिना किसी हवा के बहुत धीमी गति से झूल रही थी।


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