Rituraj Rituraj
Abstract
मिला दोस्तों से
सोचकर कि पुराने दिन
याद आएंगे,
मगर चर्चा तो
तरक्की और भविष्य की
हो कर रह गई।
वक्त
मन
मेरी हर बेचैनी की तकलीफ़, तेरी आँखों में दिखती थी माँ, मेरी हर बेचैनी की तकलीफ़, तेरी आँखों में दिखती थी माँ,
हममें से कुछ जो पढ़ गईं उनमें से कुछ हिम्मत कर लिख भी गईं हममें से कुछ जो पढ़ गईं उनमें से कुछ हिम्मत कर लिख भी गईं
हूं तो मैं भी एक इंसान मगर फिर भी, हमदर्दी के दो बोल भी सुनने न पाई हूं। हूं तो मैं भी एक इंसान मगर फिर भी, हमदर्दी के दो बोल भी सुनने न पाई हूं।
भीगी पिडंलियाँ, भीगा वक्ष यौवन सारा । मदमस्त था यमुना क भी वह किनारा भीगी पिडंलियाँ, भीगा वक्ष यौवन सारा । मदमस्त था यमुना क भी वह किनारा
क्यों इतना हठ कर बैठी हो राधे, तुम बिन नीरस होली ढोल ताशे, क्यों इतना हठ कर बैठी हो राधे, तुम बिन नीरस होली ढोल ताशे,
मैं क्यूँ पुरुष हूँ ? हम खुद से कह कर अब खुद को हैं कोसते ! मैं क्यूँ पुरुष हूँ ? हम खुद से कह कर अब खुद को हैं कोसते !
अधिक प्रगाढ़ और मधुर हो जाते हैं, देखने वाले भी आश्चर्य में पड़ जाते हैं । अधिक प्रगाढ़ और मधुर हो जाते हैं, देखने वाले भी आश्चर्य में पड़ जाते हैं ।
आज भी जहाँ नारी की मर्यादा पर प्रश्न चिह्न लगाया जाता है आज भी जहाँ नारी की मर्यादा पर प्रश्न चिह्न लगाया जाता है
जन्नत वहांँ जहांँ हैं माता-पिता के हाथ आशीर्वाद देने वाले।। जन्नत वहांँ जहांँ हैं माता-पिता के हाथ आशीर्वाद देने वाले।।
परमधाम हो हमारा क्षितिज, सदगुण हो जीवन का आधार। परमधाम हो हमारा क्षितिज, सदगुण हो जीवन का आधार।
ज़िंदगी की पतंग तुम मेरी.... मैं मांझा चढ़ा इश्क़ का मजबूत सा धागा। ज़िंदगी की पतंग तुम मेरी.... मैं मांझा चढ़ा इश्क़ का मजबूत सा धागा।
सोच में पड़ गए प्रभु सुनकर जब तर्क-वितर्क सुने जो उन सब के सोच में पड़ गए प्रभु सुनकर जब तर्क-वितर्क सुने जो उन सब के
फिर से मंदिर की ज्योत जगाई है, हमारी पुत्री ने "स्त्री-शक्ति" जो पाई है। फिर से मंदिर की ज्योत जगाई है, हमारी पुत्री ने "स्त्री-शक्ति" जो पाई है।
नौ दिन तक उपवास कराएं। आओ अपना नव वर्ष मनाएं । नौ दिन तक उपवास कराएं। आओ अपना नव वर्ष मनाएं ।
एकांत और फुर्सत इन दोनो का मिलना बहुत ही कठिन है, इस जमाने में। एकांत और फुर्सत इन दोनो का मिलना बहुत ही कठिन है, इस जमाने में।
खानपान वेशभूषा और हम सबका ही व्यवहार, सदा ही होता है देश-काल-परिस्थिति अनुसार। खानपान वेशभूषा और हम सबका ही व्यवहार, सदा ही होता है देश-काल-परिस्थिति अनुसार...
सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक प्रगति देख जटिल पितृसत्तात्मक पद्धति को अब तो तजो सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक प्रगति देख जटिल पितृसत्तात्मक पद्धति को अब तो तजो
कितने बेरोजगार और कमजोरों की कमजोरी का फायदा उठाया है। कितने बेरोजगार और कमजोरों की कमजोरी का फायदा उठाया है।
धर्म, कर्म, जीवन का सार है पैसा रिश्तों की बुनियाद, घरबार है पैसा धर्म, कर्म, जीवन का सार है पैसा रिश्तों की बुनियाद, घरबार है पैसा
फिर दुनिया के सामने तांडव करके ,अपने तीसरे नेत्र से हमें भस्म कर जाते। फिर दुनिया के सामने तांडव करके ,अपने तीसरे नेत्र से हमें भस्म कर जाते।