विवाह का निर्णय
विवाह का निर्णय
विवाह
समाज द्वारा स्वीकृत एक सामाजिक संस्था है
विवाह होना
आज के सन्दर्भ में भी
एक अनिवार्य अंग ही माना जाता है और
एक सत्यता के तौर पर इसे अधिकतर
लोगों का समर्थन प्राप्त है
यह समाज के अधिकतर वर्गों द्वारा
स्वीकार्य है
प्राचीन हिंदू विधि में विवाह एक संस्कार माना गया है
लड़का या लड़की के वयस्क होने पर
उनकी उम्र शादी योग्य होते ही
उनके परिवार वाले उनकी शादी
करने को उचित ठहराते हैं
विवाह में देरी नहीं करनी चाहिए
विवाह करना ही है तो
शिक्षा पूरी होने पर
किसी व्यवसाय या नौकरी में
खुद को स्थापित कर
एक जीवनसाथी की कमी को भी
पूरा कर ही लेना चाहिए
सही समय पर विवाह करने से
वैवाहिक जीवन सुचारु रुप से चलता है और
इसमें कम अड़चनें आती हैं
विवाह की एक सही उम्र होती है
इसके निकल जाने पर
विवाह कर तो लो लेकिन
उसकी सफलता के अवसर कम हो
सकते हैं
कई तरह के समझौते भी फिर करने
पड़ सकते हैं
परिवार को आगे बढ़ाने में भी
परेशानी होती है
देर से बच्चे पैदा होंगे तो
उन्हें पालने पोसने में दिक्कत
होती है
अधिक उम्र में
कई बार बच्चे को गोद भी लेना पड़ता है
ऐसा करने पर हो सकता है
उस बच्चे को अभिभावक
अपने खुद के पेट से जन्मे बच्चे सा
प्यार न भी दे पायें तो
बेहतर है कि
विवाह करने का मन बना ही लिया हो तो
इस कार्य को एक उचित समय पर पूर्ण कर
दिया जाये
विवाह के निर्णय को पर कभी
किसी के दबाव में आकर
न लें
विवाह का फैसला
सबकी राय जानते हुए
अंत में खुद ही लें
जिसके साथ विवाह के बन्धन में
आप बंधेंगे तो
जिन्दगी उसके साथ आपको
गुजारनी होगी
किसी अन्य को नहीं
अगर कोई उचित रिश्ता
मन मुताबिक न मिले तो
विवाह न भी करें
एक गलत निर्णय
आपकी जिन्दगी पूर्णतया
तहस नहस कर सकता है
आप जीवन में यदि
महान लक्ष्य की प्राप्ति करना
चाहते हैं तो
विवाह के विचार को त्यागकर
अपने को सम्पूर्ण रूप से
अपने लक्ष्य प्राप्ति के कार्य में
समर्पित कर दें
एक असफल विवाह और जीवन में महान कार्यों की
प्राप्ति एक साथ तो शायद मेरी दृष्टि में सम्भव नहीं हो सकते।
