STORYMIRROR

Ravindra Kandpal

Abstract

4  

Ravindra Kandpal

Abstract

विस्तार

विस्तार

1 min
595

संभावनाएँ कह रही विस्तार मन का हो अभी

प्रस्थान तन जब भी करे उत्थान मन का हो अभी,


प्रति पल प्रलय है गूंजता, है काल सम्मुख जूझता

मृत्यु से भय न हो कभी, जीवन से परिणय हो अभी।


संभावनाएँ कह रही विस्तार मन का हो अभी

जीवन धरा पर है कठिन, तांडव है प्रकटित हो रहा।

 

विध्वंश का है यह समय, सृस्टि का उद्गम हो अभी,

संभावनाएँ कह रही विस्तार मन का हो अभी।  


मन का तामस हर क्षण बड़े, दीपक की लौ है घट रही, 

बढ़ती निशा के इस पहर में, सूरज उजागर हो अभी।


संभावनाएँ कह रही विस्तार मन का हो अभी

प्रस्थान तन जब भी करे उत्थान मन का हो अभी।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract