STORYMIRROR

Sanjay Verma

Abstract

4  

Sanjay Verma

Abstract

उजड़ जाती जिंदगी

उजड़ जाती जिंदगी

1 min
532

शराब क्या होती है ख़राब 

कोई कहता गम मिटा ने की दवा 

जिंदगी में कितने गम 

और कितने ही कर्म 

दोस्तों की शाम की महफ़िल 

जवां होती, हसीं होती।


बड़े दावे बड़ी पहचान के दावे 

सुबह होते हो जाते निढाल 

रातो को राह डगमगाती 

जैसे भूकंप आया 

या फिर कदम लड़खड़ाते 

हलक से नीचे उतर कर 

कर देती बदनाम।

 

जैसे प्यार में होते बदनाम 

शराबी और दीवाना 

एक ही घूमती दुनिया के तले 

मयखाने करते मेहमानों का स्वागत 

जैसे रंगीन दुनिया की बारात आई 

तमाशो की दुनिया में 

देख कर हर कोई हँसता /दुबकता 

दारुकुट्टिया नामंकरण हो जाता।

 

रातों का शहंशाह 

सुबह हो जाता भिखारी

बच्चे स्कूल जाते समय पापा से 

मांगते पॉकेट मनी 

ताकि छुट्टी के वक्त दोस्तों को

खिला सके चॉकलेट 

फटी जेब और

खिसयाती हंसी।

 

दे न पाती और कुछ कर न पाती 

बच्चों के चेहरे की हंसी छीन लेती  

इसलिए होती शराब ख़राब 

सुनहरे ख्वाब दिखाती 

किंतु पूरे ना कर पाती।

 

डायन होती है शराब

पूरे परिवार को खा जाती 

और उजड़ जाते जिंदगी ख्वाब।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract