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कीर्ति जायसवाल

Inspirational

5.0  

कीर्ति जायसवाल

Inspirational

तू ही सच में महान है

तू ही सच में महान है

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वीर वो सैनिक तम को हराने,

जाते जिनके प्राण है;

जिस मिट्टी से मिल जाते है,

वह ही ‘दीप’ महान है।


दीपक तुम जलते जाना,

जगमग जग करते जाना;

जल-जल जितना मरुँ ‘पतंगा’,

जगमग उतना जग होगा।

दीपक तुम जलते जाना,

तुझमें आकर मर जाऊंगा।


भानु चमकता जगमग जग में,

तारकगण आकाश में;

प्रेम-तेरे बिन जो न जलता,

वह ही ‘दीप’ महान है।


शशक रूप; शिशु रूप लिए,

‘घन’ नभ में है; विस्तार में;

तड़िक-वज्र से वार किया,

इन मूकों पर तूफान ने।


अंधकार का कारण क्या?

कुछ और नहीं तूफान है;

जगमग जग जो रोशन करता,

दीप भी एक शिकार है।

बड़े भयंकर वृक्ष गिराया,

खंभ, गेह भी है मथ डाला;

वृक्ष मथे थे; खंभ मथे थे,

गेह मथे तूफान ने।


अभी-अभी अंकुर से आया,

पौधा बन जो नम्र खड़ा है;

वृक्ष है टूटे; खंभ है टूटे,

धावित नर हैरान है।

खड़ा नम्र से नम्र बना दे,

वह ही बड़ा महान है।


भूत भयानक तम में होते,

वृक्ष दिवस जो ‘यार’ है;

गुह्यतम से जो रस ले आती,

डसती तम; क्या राज है ?


ऊँट पर नर ‘मरू’ में खोजें,

और भौंरे पुष्प के बाग में;

चीर जो गिरि से लाता ‘रस’ को,

वह ही ‘कुटज’ महान है।


सूरत पर एक मुस्कुराहट,

खिलती तभी हजार है;

‘कली’ भली तू खिलती प्रांतर,

तू तो बड़ी नादान है।

उड़ते शुक है; काक-विहग है,

ऊंचाई पर बाज है;

पंगु पैर ले जो उड़ जाता,

‘बगुला’ वही महान है।


जुगनू-सा तारक जगमग जग,

नजर फेरे ‘अज्ञान’ है;

विभा भानु से ले जो जगमग,

‘चंद्र’ वह बड़ा महान है ?


पंछी नभ में; वायुयान भी,

ख्वाब भी है आकाश में;

उच्च विचार जो कर्म में परिणित,

वह ही उच्च,महान है।


व्याल न होकर डस जाता है,

व्याघ्र न हो जो गुर्राता;

तूफानों सा जकड़-पकड़ता,

कौवे-सी जबान है।

बनकर दानव बैठा ‘मानव’,

या उसका सम्राट है ?

हे नर! तेरे रुप अनेक,

तू ही सच में महान है॥


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