STORYMIRROR

Alka Deshmukh

Romance

4  

Alka Deshmukh

Romance

तुम

तुम

1 min
423

मैं जब भी देखता हूँ

तुम्हे युं मुसकुराते

अपनी धून मे खो जाता हूँ कही

अकेले में


नई नवेलीसी दिखती हो

तुम मैं बोलता हूँ

तुमसे जब भी

अकेले में

हर शय जगाती है नई 

आशा जैसें


एक जीती जागती 

प्रतिमा

नई जिंदगी की हो तुम


तुम्हारी आँखें

बोलने लगती हैं

अचानक

तुम्हारें गुलाबी'

गालों से खेलती काली जुल्फें


गालों परउतरते ही अचानक

कुछ कहती हैं

उभरती लाली

सुलगते होंठ 

गुलाब जैसें


पंखुडी नाजुक सी

मानो अब भी बड़बड़ा रही हैं

बुदबुदाहट सुनाई दे रहीं हैं

कानों मे मेरे


बुत बना खड़ा रहता हूँ

देखतां रहता हूँ

अपने अंतर मे सूनने के लिये तुम्हे

जब खेलती हो तुम नजरे झुकाये


अपने ही दुपट्टे से

चुपकें सें हसतीलजाती

झुकी आंखों से 

यूँ देखना तुम्हारा

इतनी सुंदरता ?


निहारता रहता हूँ

तुम्हें से संगमरमरी

 ताजमहल

क्यूँ हो तुम ऐसी


क्यूँ हो तुम इतनी मासूम

क्यूँ हो तुम इतनी सुंदर

मेरी आंखों में बसी

प्रतिमा सी तुम


बोल उठेगी

एक मूरत जैसे अचानक।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Alka Deshmukh

तुम

तुम

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Romance