तेरी आहट
तेरी आहट
जब आहट सुनी और नींद खुली,
तू यहीं तो थी माँ जब आँख लगी,
ना जाने कहाँ खो दिया वो सब,
वो चैन, वो सुख और जो दिया तूने सब,
याद करूँ जब तुझे, और वो स्वर,
नाम सुनती हूँ मैं अपना जीभर,
ये दुनिया और इसकी दुनियादारी,
सब बने हैं यहाँ अय्यारी,
प्यार भी लगता है समझौता,
जब कुछ ना लाया तो क्या ही है ये खोता,
खोखला सा लगता है ये ज़माना,
ढूँढते हैं यहाँ सब ख़ज़ाना,
तूने कभी बताया ही नहीं ये भी है ज़रूरी,
क्यूँ हँँसते हँसते माँगे कर दी तूने पूरी,
ज़माना क्या किसी की माँ नहीं,
या इसने खो दी है ममता कहीं,
याद है मुझे तेरा वो समझाना,
मन में जब था उदासियों का आना जाना,
अच्छा है माँ तू हर जगह नहीं,
सुन ना पाती तू वो सब जो मैंने सुनी,
क्या तूने भी है वो सब सुनी,
या हमें देखके भूल जाती थी वो कही सुनी,
मैं नहीं देख पाती तब तुझे कहीं,
क्यूँकि जहां दुःख हो, वहाँ तू नहीं,
ना जाने कब आ गई मैं यहाँ,
रास ना आए मुझे ये जहाँ,
यूँ कठोर बनके कैसे दिया मुझे भेज,
कौन रखेगा मुझे बनाके ममता की सेज,
क्या खो गया वो वक़्त जो बिताना था तेरे साथ,
कब रखेगी मेरे माथे पर अपने वो हाथ !

