सशक्त नारी
सशक्त नारी
मैं हूँ आज की सशक्त नारी,
दया प्रेम स्नेह सम्मान की पूर्ण अधिकारी।
पहुँच जाऊँ चाँद तक या छू लूँ आसमान को
हिमालय तक पहुँचने की होती हमारी तैयारी।
घर, बाहर दोनों की है जिम्मेदार निभाती,
अपने कर्म से ही अपनी पहचान बनाती,
वायुयान से लेकर साइकिल तक चलाती,
वैज्ञानिक, चिकित्सक, शिक्षिका भी बन जाती,
हर क्षेत्र में लोहा मनवाकर, कहलाती हूँ आज की सशक्त नारी।
संस्कारों और रीतियों का निर्वहन करती,
आधुनिकता के मार्ग पर भी चलती,
सही परवरिश हो बच्चों की
उसके लिए रोज नए नए ज्ञान मैं सीखती।
राजनीति में भी महारथ हासिल कर,
सशक्त देश के निर्माण में सहयोग करती।
इस तरह मैं सशक्त नारी बन
अपनी पहचान सदा ही रखती।
समाज के दोहरे मापदंड का सामना करती,
गलत का विरोध कर आगे बढ़ती,
सही का समर्थन कर उसको स्वीकार करती,
अपनी सुरक्षा का ख्याल रखते हुए,
जीवन रण में सदा ही आगे बढ़ती।
जीवन के लिए खुद को मिसाल बना,
हर क्षेत्र में सजग सचेत हो प्रवेश करती।
मैं हूँ आज की सशक्त नारी
नई इबारत लिखने के लिए सदा कर्मरत रहती।
