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Richa Bansal

Abstract

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Richa Bansal

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सोच में हूँ

सोच में हूँ

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सोच में हूँ !

जीवन के स्थायी स्तम्भ का

क्या कुछ अता- पता है ?

धरातल पे 'पदचाप ' स्वरों में 

ये कैसा तार छिड़ा है ?


सपनों के बेबाक कैनवास पर 

ये किसने गीला रंग भरा है।

ओस से भीगी की धरती को

कैसे रश्मि का संग मिला है ?


सच आँखों से हो रहा ओझल,

मन मेरा हो रहा बोझिल ,

मुझमें ये दिगान्त

प्रवासी कौन खड़ा है ?

सोच में हूँ !


आह दृगों में लिए,

पाखी तेरे पंखों पर 

किसने प्रश्नचिह्न जड़ा है ?


बचपन में खेला था खेल

'एक टांग' की लम्बी रेस

आज यथार्थ की बेलू पर

कोमल पाँव जल रहा है।


विप्लव के बादल !

एक मूसलाधार, बरस पड़

किस बात पर

इतना अड़ा है ?

सोच में हूँ !


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