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Chandresh Kumar Chhatlani

Inspirational

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Chandresh Kumar Chhatlani

Inspirational

स्मृति

स्मृति

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मिटा दो दीवारों की दरारों में
दबी हुई चीखों को।

पदचिन्हों को भून दो, 
सोशल मीडिया की पिस्टल से।

तोड़ दो इतिहास की हर निशानी,
फटे पन्नों की सच्चाई को भी राख बना दो।

लेकिन सोचो!
जो बसी है दिलों में,
उस याद को कैसे मिटाओगे?
झूठ के लड्डू किसी खेत में कैसे उगाओगे?

बहरा आकाश भी गूंजता है, अपने ही स्वर से,
सन्नाटे में कांपती हवा भी सरसराती है।
पा लक्ष्मी, घर बना दो बहुत ऊंचे तुम,
घर बनाती लेकिन यहां सरस्वती है।

तुम कौवों की उस नस्ल को खत्म कर सकते हो,
जो झूठ सुनते ही चोंच मारती है।
पर क्या करोगे उस बूढ़े की यादों को,
जो उन कौवों को पाल कर धूल बुहारती है।

तुम्हारा बनाया हुआ भय
बस उस क्षण तक टिकेगा।
जब तक तुम्हारे सामने, सिर किसी का झुकेगा।

क्योंकि निशानी मिट सकती है...
मगर याद नहीं,
ये मिटाने वाले लोग किसी को,
अब याद नहीं।


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