सम्मान पत्र और यमराज
सम्मान पत्र और यमराज
सम्मान पत्र और यमराज ********* अभी-अभी यमराज ने फोन कर मुझे जगाया और फरमाया, प्रभु! सोना छोड़ो और जल्दी से एक कविता लिखो, बदले में सम्मान पत्र का लाभ प्राप्त करो। मैंने उसे समझाया - तुझे ये किसने बताया- वो गुर्राया - किस बेवकूफ से पाला पड़ गया है मैं तेरे काम की बात करता हूँ और तू बेवजह सवाल करता है। मैंने उसे समझाया - कविता लिखना मेरा शौक है, मेरी भावना, मेरी संवेदना है जिसे मैं शब्दों में ढालता हूँ जिसे दुनिया कविता मानती है तो भला मैं क्या कर सकता हूँ। वैसे तू तो जानता है कि मैं सम्मान पत्र के लिए कविता नहीं लिखता हूँ, सम्मान पत्र मेरी कविता के लिए मिलता है, अब तू बता कि सम्मान पत्र के लालच में कविता लिखकर अपना सुख-चैन खो दूँ? या फिर अपनी कलम को सम्मान पत्र का गुलाम बना दूँ। मेरी बात सुन यमराज भड़क गया तुझसे तो कुछ कहना बेकार है क्योंकि तेरी एक सदस्यीय सरकार है। बस यार! बिना तर्क वितर्क के कुछ भी लिखकर सिर्फ कविता का नाम दे दे, लेखक की जगह मेरा नाम लिख दे, कम से कम एक सम्मान पत्र मुझे ही दिला दे। मैंने गहरी साँस ली- अब समझा आखिर तुझे इतना प्यार क्यों आया? जो तूने मुझे फोन कर जगाया। वो बड़बड़ाया - तू कुछ भी समझ बस एक कथित कविता लिखकर दे दे, बाकी सब मैं कर लूँगा, और मिलने वाला सम्मान तुझे समर्पित कर दूँगा, भविष्य के लिए संस्थान को शीशे में उतार लूँगा, कवि के रूप में सम्मान पत्रों का ढेर लगा दूँगा कवि यमराज के नाम के झंडे गाड़ दूँगा, मगर तू चिंता बिल्कुल मत कर सारा श्रेय तेरे हिस्से में कर दूँगा, तू मेरा यार है, ये सबको पता है इसलिए एहसान बिल्कुल नहीं मानूँगा, अब फोन रख और जल्दी से कविता लिख और मेरे व्हाट्सएप पर भेज दे बाकी सब कुछ मैं कर लूँगा साथ में तेरा आभार, धन्यवाद व्हाट्सएप मैसेज के रूप में भेज दूँगा। सुधीर श्रीवास्तव
