शीर्षक: आहट कंगन की
शीर्षक: आहट कंगन की
कौन कहता है कि तेरी आहट नहीं है
तू नहीं साथ तो क्या मेरे कंगन की आहट तो है
कौन कहता है गहरी काली रात में अकेलापन दुखद
तू नहीं साथ तो क्या मेरे कंगन की खनखनाहट तो है
कंगन मेरा मेरे जीने की आस ही तो है
कौन कहता है कि मेहँदी रंग लाती हैं
तू नहीं तो मेरे कंगन मेहँदी को सजाते है
कौन कहता है सपने देखना है तो अंधेरा भी हो
अंधेरा ज़रूरी नहीं खुली आँखों से तेरा दीदार होता है
कंगन मेरा मेरे जीने की आस ही तो है
कौन खत हैं कि पा लिया तुमने मुझको
सुनो ना ! जीतना चाहते हो तो पा लो मुझे मुझसे
अपनेपन का घूँट कई बार जीतने का संकेत देता है
तभी प्रीत में जीत की मिठास दुगुनी होती हैं
कंगन मेरा मेरे जीने की आस ही तो है
कौन कहता है कि स्याह रातें डराती हैं
तेरी आहट तो पल पल साथ मेरे चलती हैं
मैं कहाँ अकेली हूँ रातों में कभी
तेरी आहट मेरे साथ साथ चलती हैं
कंगन मेरा मेरे जीने की आस ही तो है।
