STORYMIRROR

Mumuksha Nagotia

Abstract Drama Tragedy

3  

Mumuksha Nagotia

Abstract Drama Tragedy

शायद ,या शायद नहीं

शायद ,या शायद नहीं

1 min
213

हर दिन अपने अंदर 

किसी अनजान स्त्रोत से ऊर्जा भरकर 

परिचय देता हूँ अपना 

उस दुनिया को 


जो मुंह मोड़ती है मुझसे हर बार 

जैसे नकार दिया हो मेरा अस्तित्व 

जैसी देखकर एक नज़र किया हो अनदेखा 

सहम कर लौट आता हूँ 

दोहराने कल फिर वही बात 


शायद मेरे परिचय में है खोट 

शायद भाँप लेते हैं 

वे इसके पीछे का डर ,शायद 

या शायद नहीं



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract