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Suresh Kulkarni

Abstract

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Suresh Kulkarni

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सावन

सावन

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बरसन लागी सावन धार

रह गये बालम नदिया पार

बरसन लागी सावनधार


बार बार मै बाट निहारूं

चैन न आये जिया सकवार

बरसन लागी सावनधार


उमड़ घुमड़ घटा घनी छायी

चमके दमके बिजुरी की तार

बरसन लागी सावनधार


पवन करे अपनी मनमानी

करकर बाजे द्वार कवाड

बरसन लागी सावनधार


बड़ी हवेली मै नार अकेली

छाये अंधियारा खोये चैन हमार

बरसन लागी सावनधार!



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