सावन के बहार में ना
सावन के बहार में ना
सावन के बहार में ना...
✍🏻 ‘राज़’
एक दिन अवतू हे प्रिया ससुराल में,
सावन के बहार में ना...
झूला डाल दे बे निमिया के डार में,
सावन के बहार में ना...
गुझिया तोहसे हम बनवाईबे,
अपने हाथ से खियइबे।
चींटी काट ले बे घूंघट के आड़ में,
सावन के बहार में ना...
लाली चुनरिया पहिर के अइबू,
खुशबू पसर जाई अंगना।
सैंया कहिहें – “का परी लगतू”,
हम हँसी छिपाइब अंगना।
कजरारे नयन से ताकब हर बार में,
सावन के बहार में ना...
चूड़ी छनकई पैंजनिया बाजे,
झूला झुलइब तोहरे संग।
हम ओढ़नी से बाँधब तोहके,
तू मुस्की मारब अंग-अंग।
बिजुरी चमकेले जईसे, हम चमकीं प्यार में,
सावन के बहार में ना...
बरखा बरसे, अंगना भींजे,
तोहर बाहों में अँखियाँ रुक जाईं।
तू कहिह “बोलs ना कुछ अब”,
हम कहब – “लाजे गलबहियाँ झुक जाईं…”
सुगंध घुलल रहे तोहर उपहार में,
सावन के बहार में ना...
सासु बोलैं – "बहू सुधरि जइबू?"
हम कहब – "तोहके पियवा सुधरइहें!"
ननदिया हँस-हँस बइठल रहली,
हम कपड़ा गाढ़त मुसकइहें।
घरेलू प्रेम के गावत बिसराल गीत-गारी में,
सावन के बहार में ना...
एक दिन तू अइबू चुपचाप,
नज़रें झुका के बाजत चाल।
हम हथेली पे नाम लिखब तोहार,
लाली रंगाई सँवरल गाल।
मन के मंदिर में दीप जरइब हम विचार में,
सावन के बहार में ना...
- ©गुरुदास प्रजापति 'राज़'

