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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract Others

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

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सागर

सागर

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एक अलग दुनिया है सागर की

न जाने कितने जीव जंतु

वनस्पतियों का 

घर होता है यह

जिस तरह घर में 

भाई बहन लड़ते हैं 

उसी तरह यहां भी 

लड़ाई चलती रहती है 

बड़ी मछली 

छोटी को निगल जाती है

कुछ मगरमच्छ भी 

घड़ियाली आंसू दिखाकर 

मासूम मछलियों को 

फंसा लेते हैं 

और उनका शोषण करते हैं

भांति-भांति की मछलियां

अद्भुत छटा बिखराती हैं 

अपनी खूबसूरत अदाओं से 

सबका मन ललचाती हैं

ऑक्टोपस जैसे असंख्य जीव 

अपना जीवन सागर से पाते हैं 

फिर एक दिन 

उसी सागर में समा जाते हैं


बहुमूल्य खनिजों का 

भंडार भरा है यहां 

पेट्रोलियम पदार्थों का 

खजाना गढ़ा है यहां

मछुआरे अपनी आजीविका

सागर से ही चलाते हैं 

सागर के बीच में टापू 

आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं


धीरज का दूसरा नाम

सागर कहलाता है 

अपने आंसुओं को जो 

खुद ही पी जाता है

अपनी मर्यादा क्या है 

ये सागर से बेहतर कौन जानता है 

अपने भीतर उठने वाले 

झंझावातों को सहन कर जाता है

उसकी गहराई का पता लगाना 

हर किसी के बस की बात नहीं 

मानव मन की तरह 

होते यहां घात प्रतिघात नहीं


सागर सी गहरी आंखें 

क्या खूब लगती हैं 

इन दो आंखों में ही 

आशिकों की दुनिया बसती है

सागर की लहरों से 

सपने रोज बनते बिगड़ते हैं 

सारे दरिया एक दिन आकर 

सागर में ही सिमटते हैं।



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