STORYMIRROR

अच्युतं केशवं

Abstract

3  

अच्युतं केशवं

Abstract

रवायतों के गुलाम हैं जो

रवायतों के गुलाम हैं जो

1 min
331

इधर तकल्लुफ उधर तकल्लुफ समझ लो गहरे यार नहीं हैं

रवायतों के गुलाम हैं जो पनपता उनमें प्यार नहीं हैं।


निभाना रिश्ते किश्त सी भर, तन से साथी मन से पराये.

कसकते दिल ही जान जाए धोखा हुआ न पहचान पाए

वृथा हैं रिश्ते व्यर्थ नाते, जुड़े जो दिल के तार नहीं हैं।


दिली कबूली दिली सबूरी, मिली न दिल को क्या जिन्दगी है

अगर हृदय में रहा अँधेरा, कर में दीपक क्या बन्दगी है

दुहाई देते रस्म की वो, नजरें हुईं गर चार नहीं हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract