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Ajay Prasad

Abstract

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Ajay Prasad

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रो पड़ा

रो पड़ा

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कत्ल कर के मेरा, कातिल रो पड़ा

कर सका कुछ जब न हासिल,रो पड़ा ।


खुश समन्दर था मुझे भी डूबो कर

अपनी लाचारी पे साहिल रो पड़ा ।


आया तो था वो दिखाने धूर्तता

सादगी पे मेरी कामिल रो पड़ा।


जो बने फिरते हैं खुद में औलिया

हरकतों पर उन की जाहिल रो पड़ा ।


की मदद मज़दूर ने मजदूर की

अपनी खुदगर्जी पे काबिल रो पड़ा ।


जा रही थी अर्थी मेरे प्यार की

हो के मैयत में मैं शामिल, रो पड़ा ।


बिक गया फ़िर न्याय पैसों के लिए

बेबसी पे अपनी आदिल रो पड़ा




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