STORYMIRROR

Anand Barotia

Abstract

2  

Anand Barotia

Abstract

रौशनी की राख़

रौशनी की राख़

1 min
82

रौशनी... यूँ ही नहीं फैलती इस दुनिया में

हर बार कोई उसे फैलाता है 

हम इस बात का दावा कर सकते है क्यूंकि हमने देखा है

हर बार कोई जलता है और राख छोड़ जाता है.


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract