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Piyush Kherajani

Inspirational

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Piyush Kherajani

Inspirational

रावणवाणी

रावणवाणी

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माना मैं सीता को हर लाया, जगदम्बा का किया अपमान था,

परंतु शूर्पणखा भी तो एक नारी थी, राम–लक्ष्मण को उसका भी रखना मान था।


वो रास रचाना चाहती थी, क्योंकी यही उसका ज्ञान था,

तुम भी तो परमज्ञानी थे, तुम्हें उसे बहला–फुसलाकर कर देना शांत था।


नाक काट दी तुमने उसकी, खर–दूषण से हुआ तुम्हारा युद्ध था,

जो हत्या की तुमने मेरे भाई की, तो शांत कैसे रहता मैं थोडी न गौतम बुद्ध था।


अब आ रहा हूं बद्तमीज़ी पे, क्योंकि अब सहा नहीं जाता,

और सुनले राम! गर विभीषण न होता, तो तू मुझे कभी हरा नहीं पता।


था त्रिलोक विजयी रावण, जिसे कोई हरा नहीं पाया था,

मैं वही रावण हूं, जिसने कैलाश को अपनी भुजाओं पर उठाया था।


तू मारने को मुझे अपनी वानर सेना लाया था, फिर नतीज़ा देखा तूने,

कि कैसे मेरे राक्षसों ने तेरे वानरों को, उठा–उठा के खाया था।


पहले मैं अच्छा था, और मेरे जैसा अच्छा कोई बन भी नहीं पाया था,

अरे राम! तू तो खुद एक शिवभक्त है, तुझे नहीं मालूम कि किसने शिव की सर काट काट के चढ़ाया था।


माना मैं तेरे दर का एक छोटा सा द्वारपाल था, 

परंतु याद रखना मैं वही रावण हूं, जिसके पुत्र ने स्वर्ग में किया कमाल था।


( यह रावणवाणी है इसका कोई भेद नहीं,

  जो कहा सब सत्य है और मुझे इसका कोई खेद नहीं। )


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