पिया तुम्हारे सिवाय
पिया तुम्हारे सिवाय
पिया तुम्हारे सिवाय बिल्कुल,
मुझको कुछ भी नही भाता...
तुम्हे देखते हुए भी दिल
ये मेरा प्रेम गीत गुनगुनाता....
जैसे अवनी के अंबर हो तुम,
मेरी कविताओ के तुम ही शब्द
तुम्हारी ही बाहो में रात दिन
होना चाहती हूं मैं मंत्रमुग्ध....
पिया तुम्हारे सिवाय बिल्कुल,
मुझको कुछ भी नही भाता...
आता जब रवी सुनहरी किरणों की
नभ में बौछावर शुरु हो जाती...
पिया तुम पे लिखी हर एक
कविता भी मुझ में जान लाती...
तुझ संग रंग लाई प्रीत हमारी,
यह मेरा है सौभाग्य...
कागज के पन्नो में भी दिखते
उसमे हो सैय्या लय और राग...
पिया तुम्हारे सिवाय बिल्कुल,
मुझको कुछ भी नही भाता....
कभी बनकर शब्द आते हो
कविता मैं रंग तुम ही तो लाते...
कभी बिना बात किए भी मेरी
चंद नजरो पे हो तूम मुस्कुराते...
कभी कहते राधा कभी मृगनयनी
पिया चल लेके तुम अपने गांव...
जानना है मुझे भी तेरे मन के
भीतर बसा हुआ मेरे प्रति भाव...
यह दिल दिलो जान से भी ज्यादा
धडकता है पिया तुम्हारे लिये...
आसमान से भगवान ने तुम्हे
पृथ्वी पे भेजा सिर्फ हमारे लिए।

