फिर से हम?
फिर से हम?
तीनों का वो रिश्ता, दिलों से बंधा था,
एक छोटी सी दरार ने सब कुछ बदल डाला।
बातें तो हमने भी कीं, खामोशियाँ भी रहीं,
पर कुछ कदम तेरी तरफ़ से भी आते तो सही।
वो हँसी, वो लम्हे, अब भी याद आते हैं,
बीच की ये दूरी, थोड़ा सा सताते हैं।
गलती अगर हमसे थी, मानने में हर्ज़ क्या,
पर हर बात में झुकना भी, अब सही नहीं लगता।
चल, बीती बातें यहीं छोड़ देते हैं,
दिल हल्का कर, फिर से जोड़ लेते हैं।
न कोई इल्ज़ाम हो, न कोई शिकायत रहे,
बस सच्ची सी दोस्ती, फिर से कायम रहे।
अगर तू चाहे, तो रास्ते अभी भी हैं,
हम यहीं हैं—बस इरादे साफ़ होने चाहिए।
अकृति राजावत
