STORYMIRROR

Aarti Sirsat

Abstract Classics Inspirational

4  

Aarti Sirsat

Abstract Classics Inspirational

ओ रे पिता

ओ रे पिता

1 min
260

ओ रे पिता, मैं तो 

तुझ से बनी हूँ!

हाथ पकड़कर 

तुम्हारे साथ चली हूँ।


अपनी ऐ जान, मैंने 

तुझ मे बसाई है!

कहने से पहले मैंने, हर 

चीज अपने पास ही पाई है।


मेरा अस्तित्व तुम, मैं तो 

बस तुम्हारी परछाई हूँ!

मेरा जीवन तुम, मैं तो बस 

छोटा सा हिस्सा बन पाई हूँ।


कर्ज तुम्हारा सौ जनम 

मे भी उतर न पाए!

हर जनम मेरा 

तुम्हारे ही नाम हो जाए!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract