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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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नयी प्रजाति

नयी प्रजाति

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ना कर पाऊँ मैं अपनी गलती का अहसास

सिर्फ़ दूसरों को दोष देना ये गुण है मुझमें ख़ास।

सच क्या है ये मैं कभी देख नहीं पाती 

दूसरों में कमियाँ निकाली मुझसे जाती।


मुझे मेरी अकड़ पाती नहीं छोड़

दूसरों का कोमल हृदय देती हूँ मैं तोड़।

अपनी की हुई भूल की कभी माँगी नहीं मैंने माफ़ी

नसीहतें और सीख भी पड़ी नहीं मुझे काफ़ी।


मैंने देखी नहीं कभी ख़ुद के भीतर की झांकी

लोगों को ठेस पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी बाक़ी।

काश दिखा देता कोई मुझे मेरे मन का दर्पण 

तो कर देती मैं अपनी भूल के लिए समर्पण।


लोगों को उनकी भूलों का एहसास कराती हूं

मैं ज्ञानी हूं बहुत इसलिए न खुद को कभी समझाती हूं।

सब अपनी गलतियों का रखना ध्यान

मुझ जितना तुम में नहीं है ज्ञान।


मनुष्य की एक नयी प्रजाति से परिचय हुआ है जिनकी फ़ितरत कुछ ऐसी है ।



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