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Hardik Mahajan Hardik

Abstract

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Hardik Mahajan Hardik

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मुसीबत

मुसीबत

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मैं ना जाने किस मुसीबत में पड़ा हूँ।

ना रात ना दिन ठीक से देख रहा हूँ।


समय जैसा मेरा अब थम सा गया हैं।

जाने क्यूँ हर वक़्त कहीं खो रहा हूँ।


मझधारों से मझधार में पड़ गया हैं।

सुनों "हार्दिक" अब यही कह रहा हूँ।


कहीं ना कहीं बस तुम मुझें याद हो।

यहीं रब से तुम्हारी दुआ कर रहा हूँ।


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