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shekhar kharadi

Abstract

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shekhar kharadi

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मृगनयनी

मृगनयनी

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मृगनयनी बनकर ,

भटकूँ यहाँ वहाँ

मिले बसेरा मन भर

सजाऊँ हृदय तन भर  ,

जलाऊँ दीप रात भर

बुझाऊँ लो न एकबार ,

मनाऊँ दिपोत्सव हरबार 


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