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Nikhil 54

Abstract

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Nikhil 54

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मोहब्बत मुझे तू कभी समझ नहीं आया

मोहब्बत मुझे तू कभी समझ नहीं आया

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मोहब्बत मुझे तू कभी समझ नहीं आया।

कोशिश की थी मैंने भी , मगर कोई समझा ना पाया।

मोहब्बत , मुझे तू कभी समझ नहीं आया।।

यूं तो अक्सर कई नगमे सुनता हूं मैं , हर रोज़ किसी के यादों में , 

पर किसी के लिए नगमों को गुनगुना ना पाया

मोहब्बत मुझे ........

आसमान पर कई बादल दिखते है मुझे अक्सर 

वो बरसन के लिए तैयार है , मगर वो कभी बरसना पाया।

मोहब्बत मुझे तू......

ज़िन्दगी की सच्चाई है दोस्तों , मिलके बिछडो

बिछड़ के मिलो , मगर बिछड़ कर उससे दुबारा कभी मिल ना पाया 

मोहब्बत , मैं तुझे कभी समझ ना पाया।।


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