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Samreen Eram

Abstract

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Samreen Eram

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मोहब्बत की कज़ा

मोहब्बत की कज़ा

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बढ़ते फासले, यह कैसी है सज़ा

ऐ ख़ुदा क्या यही है तेरी रज़ा

क्यों भरी है बदगुमानी से उनकी निगाह

इस बेरूख़ी की क्या है वजह

इबादत के ख़ुलूस की है इलतजा

यह मोहब्बत है अब भी तुझ पर कज़ा!


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