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Richa Bharti

Abstract


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Richa Bharti

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मन

मन

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मन करता है

उड़ती रहूं परिंदों की तरह।

मन करता है

मंडराती रहूं भंवरों की तरह।


पर ऐ निश्छल मन

वक्त की सुई को देख।

शाम ढलने को आई है

परिदें भी घर को लौट चले हैं।


आ तू भी अब लौट चल

रात के चकाचौंध से

सुबह के उजाले में

सपनों की सैर से

हकीकत की दुनिया में।


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