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Bal Krishna Mishra

Classics

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Bal Krishna Mishra

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मन की वीणा और शब्दों के सुर

मन की वीणा और शब्दों के सुर

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मन  की  वीणा  मौन  खड़ी थी, 

भावों की कली अनखिली थी।

तुमने  छूकर  तार  जगाए, 

शब्दों  के  सुंदर  सुर  गाए।


जब  अंतर्मन  का  तार  बजा, 

अहसासों का एक संसार सजा।

हर एक शब्द में प्रीत जगी, 

जीवन की धुन संगीत लगी।


वीणा  की  झंकार  हो तुम, 

शब्दों  का  श्रृंगार हो तुम।

जो बिखरे थे खामोश कहीं, 

उन गीतों की हुंकार हो तुम।


सुर से सुर जब मिल जाते हैं, 

कोरे कागज भी खिल जाते हैं।

मन की वीणा जब गाती है, 

हर कड़वाहट मिट जाती है।


मन की वीणा मौन खड़ी थी, 

भावों की कली अनखिली थी।

तुमने छूकर तार जगाए, 

शब्दों के सुंदर सुर गाए।


~बाल कृष्ण मिश्रा , नई दिल्ली |


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