Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Lalita Verma

Tragedy


3  

Lalita Verma

Tragedy


मजदूर

मजदूर

1 min 298 1 min 298

जमाने भर कौन याद रखेगा,

जिन्दा है मगर,

जिन्दगी है धुआँ-धुआँ ।


न खाने को रोटी है ,

न पीने को पानी। 

छोड़ के आशियाना अपना,

लौट घरौंदों में जा रहा।

जमाने भर कौन याद रखेगा। 

जिन्दा हैं मगर,

जिन्दगी है धुआँ-धुआँ। 


कंधों पर बूढ़ी माँ,

हाथ में झोला लिए। 

पैरों में छालों की खड़ाऊं,

तेज धूप की चादर ओढ़े।

मजबूर है वो मजदूर,

ख़ाली पेट चला जा रहा ।

जमाने भर कौन याद रखेगा ।

जिन्दा है मगर ,

जिन्दगी है धुआँ -धुआँ। 


संवेदन हीन बना मानव,

जो है रीढ़ की हड्डी देश की।

वही दर दर भटक रहा,

भूख प्यास से तड़प रहे।

कुछ यमराज ने गले लगाये,

कुछ यमराज के मुंह से बचकर

चला जा रहा पग-पग।

जमाने भर कौन याद रखेगा। 

जिन्दा है मगर ,                    

जिन्दगी है धुआँ धुआँ। 



Rate this content
Log in

More hindi poem from Lalita Verma

Similar hindi poem from Tragedy