STORYMIRROR

Bhoopendra Bhoopendra

Romance

4  

Bhoopendra Bhoopendra

Romance

मेरी पहली कविता

मेरी पहली कविता

1 min
609

वो दिन भी क्या दिन थे

जब घंटो बीत जाते थे

तुम्हें निहारने के इन्तजार में

और फिर तुम निकला करती थी

यूँ सज सवंर कर।


की हम तुममे ही खोये रहते थे

तुम्हें देखकर तुम्हें सोचकर

हम गाना गाते थे

अपने ही बनाये हुए ख्यालों से

जाने कितने गीत

अपने आप बन जाते थे।


तुम्हारे सामने खुद को

गंवार पाते थे

किन्तु प्यार सच्चा था

इसलिए ज्यादा न घबराते थे

इतने दूर से तुम्हे देखते थे

किन्तु उस मौके को भी

कभी हम न गंवाते थे


फिर तुम कभी कभी

रिमझिम करती

मेरे नजदीक आ जाती थीं

और ऐसी गुदगुदी मचा देती थी


कि फिर ख्यालों में

दिनों खोये रहते थे

कि अब तुम कब मिलोगी

वो दिन भी क्या दिन थे

फिर आज उनको पाने का

जी करता है

फिर से वहीं लौट जाने को।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance