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Govind Tamboli

Abstract

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Govind Tamboli

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मेरा घर

मेरा घर

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कुछ यूं रूबरू हुआ कल ज़िन्दगी से,


निकला था चंद खुशियां बांटने ,

वापसी में खुशियों का खजाना था।


वो गांव था या घर मेरा, बसा प्यार मोहब्बत-सा गलियारा था

खिलते खेत-खलिहान, चहुँ ओर हरियाली का आशियाना था।


खिलखिलाती सरसों पर, इतराता वो प्यादा था

छाछ-मक्कई-घी-गुड़-माखन, ये पांच पकवानों का न्यौता था।


दिलों की बढ़ती मोहब्बत का, ये छोटा-सा तोहफ़ा था

हाँ कुछ यूँ रुख्सत हुआ जिंदगी से, वो गांव था घर मेरा।


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