STORYMIRROR

Shishir Mishra

Abstract

4  

Shishir Mishra

Abstract

मैं यहाँ नया प्रह्लाद हूँ

मैं यहाँ नया प्रह्लाद हूँ

1 min
166

मिटता नहीं मस्तक पर लिखा 

मैं लहू सा प्रगाढ़ हूँ

अग्नि की तपन हूँ मैं

 दहकता सैलाब हूँ 

भक्ति भवानी की मैं 

शिव का ताण्डव विशाल हूँ।


किलकारियाँ शावक की जैसे 

मैं खोया हुआ अभिशाप हूँ 

खटकता नज़र में हूँ हर किसी के 

मैं यहाँ नया प्रह्लाद हूँ।


किसी का राही हूँ मैं

किसी के मंज़िल की पहचान हूँ 

डूबता हर रोज़जिन यादों में 

मैं उन्ही का क़ब्रगाह हूँ।


दफ़न हैं मुझ में ही विरासतें सारी

मैं ही इस शहर की थकान हूँ 

फ़ुरसत हूँ मैं गाँव की

मैं ही वो नीम की छांव हूँ।


हर भागती भीड़ का शोर हूँ 

मैं अपनो का प्यार और

तेरे रातों का सुकून हूँ।


मैं ही मन हूँ तेरा

तेरे अंतर्मन की आवाज़ हूँ

मैं रूह हूँ

तेरे होने की पहचान हूँ।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract