STORYMIRROR

Atul singh

Tragedy

4  

Atul singh

Tragedy

मैं एक पुरुष हूं

मैं एक पुरुष हूं

1 min
219

हां मैं एक पुरुष हूं,

सख्त, रूखा, और 

नयनों में जरा सी नमी नहीं।

मैं एक मर्द हूं

तुम्हारी तरह रो नहीं सकता

आँखो की कारों पर

आ भी जाए नमीं तो

छुपा कर पोंछ लेता हूं,

कोई क्या कहेगा -

"मर्द होकर रोता है।"

रोना सिसकना, घुट कर रह जाना,

ये सब तो औरतों के लिए है।


मैं एक पुरुष हूं,

पर आज तुम्हें बताता हूं

मेरे अन्दर भी एक दिल धड़कता है,

संवेदना और जज़्बात का ज्वार उमड़ता है,

पर सरेआम मैं तुम्हारी तरह

सबके सामने रो नहीं पाता,

आखेँ भर भी आयें अगर

तो मुँह फेर के पोंछ लेता हूं।

दुःख, तड़पन, विरह,

हर हर भाव को

शिद्दत से महसूस करता हूं,

पर तुम औरतों की तरह

कहीं भी, किसी के भी सामने,

भीड़ में,कन्धे पर सिर रख ,

किसी के भी गले लग,

बहा कर आँसू,

खुद को हल्का

नहीं कर सकता।


हां मैं एक पुरुष हूं,

अकेले में रोता हूं ,

सिसकता हूं,

अपने घावों की खुद

तुरपाई करता हूं।


हां मैं एक पुरुष हूं,

आता हूं जब किसी के समाने

एक सख्त,निर्विकार, रूढ़,

व्यक्ति का मुखौटा लगा लेता हूं।

ताकि मेरे पुरुषत्व पर कोई

ऊंगली ना उठाए,

"मर्द होकर रोता है"

यह ताना न दे जाए।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy