STORYMIRROR

Prashant Kaul

Abstract

4  

Prashant Kaul

Abstract

मानो जैसे कल ही की तो बात थी

मानो जैसे कल ही की तो बात थी

1 min
456

मानो जैसे कल ही की तो बात थी

गले लगना प्यार की पहचान थी

मिल बांट कर खाने में कमाल की मिठास थी

मानो जैसे कल ही की तो बात थी।


दफ्तरों की चहल-पहल की अलग ही बात थी

निकल जाता दिन पलक झपकते

और शाम यारों के साथ कटती मज़ेदार थी

मानो जैसे कल ही की तो बात थी।


बेखौफ दिलों की धड़कनें थी

और सांसो में ना खराश थी

मानो जैसे कल ही की तो बात थी।


बाजारों में भीड़ बेशुमार थी

सड़कों पर गाड़ियों की लंबी कतार थी

मानो जैसे कल ही की तो बात थी।


रोज़ नए चेहरों से बातें होती थी

और कुछ याद रह जाने वाली मुलाकातें होती थी

मानो जैसे कल ही की तो बात थी।


यारों का साथ था अपनों की सौगात थी

हाथों में हाथ था और लबों पे मुस्कान थी


मानो जैसे कल ही की तो बात थी

मानो जैसे कल ही की तो बात थी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract