क्या लिखूँ
क्या लिखूँ
सूरज-चाँद तुम्हीं बतलाओ, दिन या फिर मैं रात लिखूँ,
उजियारों के लिए लिखूं या अंधियारों की बात लिखूँ,
दिन की बातें बहुत हुईं अब रातों पर भी चर्चा हो,
सुदृढ़ मंजिलें बन जायेंगी नीवों पर भी खर्चा हो,
बिस्मिल, शेखर, भगत और आज़ाद के वो अरमान लिखूँ,
सूरज-चाँद तुम्हीं बतलाओ, अब दिन या रात लिखूँ...
एक तरफ दूजे ग्रह में जीवन की खोजें होती हैं,
वहीं गरीबों की दुनिया में भूख से मौतें होती हैं,
दर्द भरी इस लेखनी से कैसे गीत मल्हार लिखूँ,
सूरज-चाँद तुम्हीं बतलाओ अब दिन या रात लिखूँ...
ये विकास का भवन टिका है जीवन की जिन ईंटों पर,
हर किसान का वोट मिला है संसद की इन सीटों पर,
उस किसान के आँखों की बेमौसम की बरसात लिखूँ,
सूरज-चाँद तुम्हीं बतलाओ अब दिन या रात लिखूँ,
मर्यादा और त्याग शील का पाठ मिला रघुराई से,
गीता का उपदेश मिला है हम को कृष्ण कन्हाई से,
मानवता के लिए है जीवन, मानवता के नाम लिखूँ,
सूरज-चाँद तुम्हीं बतलाओ अब दिन या रात लिखूँ।।
