खुशी
खुशी
जाने क्या मिल गया,मन कुलाचे भरे
इतना इतराए क्यूँ,क्यूँ न कुछ ये कहे
होंठो मे छलकती हँसी को छुपाए,
आईना भी इसे,आज बिल्कुल न भाए
मन की रफ्तार नापो,पकड़ में ना आए
इसकी धड़कन किसी .....से छुप न पाए
बंद मुट्ठी में ऐसा,....छिपा है क्या जाने
ओट आँचल की करके उसे क्यू छिपाए
बैठी खुद से क्या बातें बनाने लगी
बावरी सी बनी ..... गुनगुनाने लगी।
