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हरीश कंडवाल "मनखी "

Inspirational

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हरीश कंडवाल "मनखी "

Inspirational

जिंदगी तेरे लिये

जिंदगी तेरे लिये

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जिंदगी ये बता क्या क्या करूं तेरे लिये

सितम ढाऊं या सितम सहूँ तेरे लिये

गिनकर चार दिन मिले हैं जीने के लिये

वह भी गुजर जाते हैं, गुजर बसर करने के लिए।


बचपन बीत जाता है, नादानी समझकर

अल्हड़पन गुजरता है, स्कूल में पढ़कर

आधी जवानी निकल जाती है, नौकरी ढूंढकर

शेष जवानी बीत जाती, गृहस्थी की गाड़ी खींचकर।।


बुढ़ापे में तो साथ छोड़ने लगती है काया,

मन में बसी रहती है केवल अंधी मोह माया

लट्टू की तरह घूमते रहे, आसरा ढूंढते रहे

मगर ना मिल पायी, संतुष्टि की छाया।।


जिंदगी चार दिन का एक नाटक है

हर किसी को अपना किरदार निभाना है

किसी को अच्छा तो किसी को बुरा बन जाना है

एक दिन मौत ने इस पर अपना पर्दा गिराना है।




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