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Dipak Dev

Abstract

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Dipak Dev

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इश्क़

इश्क़

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चलते-चलते ठहरने का मज़ा ही कुछ और है, 

निखरने के लिए बिखरने का मज़ा ही कुछ और है !

इश्क़ खुद इश्क़ के काबिल है महबूबा हो न हो, 

इश्क़ से इश्क़ करने का मज़ा ही कुछ और है !

बहुत लोग जी रहे मर-मर के मरने के लिए, 

ज़िंदा रहने के लिए मरने का मज़ा ही कुछ और है !

ख़ौफ़ नहीं मज़हब या सियासत का "क्रांति" को, 

पर अपने ज़मीर से डरने का मज़ा ही कुछ और है !!



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