STORYMIRROR

Aarti thakur Learning to share

Abstract

3  

Aarti thakur Learning to share

Abstract

हम खानाबदोश हुए

हम खानाबदोश हुए

1 min
455

जिनके घरों में शीशे हैं

वो कुछ इस तरह मेहरबाँ हुए

हम कहीं के न रहे,

हम खानाबदोश हुए!


साँसों को भी उन्होंने न

हमारी छोड़ रखा ज़ालिम

डरते हैं खुली हवा में साँस लेने से

हम पर्दानशीं हुए!


आज राह ली है 

अम्मा तेरी डेहरी पे आएँगे

पर सोचता हूँ 

क्या वहाँ भी ठुकरा दिए जाएँगे?


देखो हमने भी सिख ली है

सोशल डिसटेंसिंग!

लॉकडाउन उनका हुआ 

हम न घर के हुए ना घाट के हुए।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract