STORYMIRROR

Chetna Gupta

Abstract Tragedy

4  

Chetna Gupta

Abstract Tragedy

घर

घर

1 min
348

इसी घर का सपना देखा है मैंने,

सब बच्चे बचपन में यही सोचते होंगे,


कि ऐसे ही घर में वो जन्में,

पर जब होने लगे यह मेरे नन्हे पैर बड़े,


समझी मैं की रहती हूं कि

एक ऐसे घर में जहाँ बस लोग लड़े,


इसलिए यह घर है सपना

मेरे कई सपनो में से।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Chetna Gupta

Similar hindi poem from Abstract